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NUMEROLOGY By Institute of Vedic Astrology Jan 17 2020

अंक विज्ञान क्या है -सभ्यता का पहला मापदंड अंक है, क्योंकि जीवन में जो कुछ भी घटित हुआ है, हो रहा है या होगा। उसे व्यक्त करने के लिए भाषा के बाद हमें अंको का ही सहारा लेना पड़ेगा। किसी भी परिणाम का प्रारंभ और अंत अंक ही है। यद्धपि यह निश्चित है, कि अंक विज्ञान विश्व का सर्वाधिक प्राचीन व उन्नत विज्ञान है, पर आज के युग में जिस गति से मानव के निकट आया है। उसे ध्यान में रखते हुए यह कहा जा सकता है, कि अंक ही आज के मानव का सर्वाधिक विश्वस्त मित्र है। उसका सहचर है, सुख-दुख का संभागीय सहायक है, पथ प्रदर्शक है और पूर्णता सक्षम है। आप भले ही इसे छोड़ दें पर यह आपके निकट है। आपके जीवन का प्रत्येक क्षेत्र अंक शास्त्र से बंधा है। इसके द्वारा आप यह जान सकते हैं, कि आज का दिन आपके लिए कैसा है या अगला सप्ताह क्या होने वाला है और आपको क्या करना चाहिए। हमारा पूरा जीवन ही अंको का जीवन है, उदाहरण के लिए यदि किसी व्यक्ति की जो जन्म तारीख होती है। वह जन्म तारीख उसे बहुत प्रिय होती है। वह उसके जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग बन जाती है, साथ ही उसके परिवार वालों के लिए भी वह बड़ी महत्वपूर्ण हो जाती है और वह तारीख व्यक्ति के जीवन में उत्साह का अनुभव देती है। इसलिए हम यह सब याद रखते हैं, कि हमारी शादी कब हुई, हमारी नौकरी कब लगी, हमारी पढ़ाई कब पूरी हुई या हमारे घर में कौन सा शुभ कार्य किस तारीख को हुआ था।

अंक विज्ञान में अंकों के प्रकार - अंक विज्ञान में अंक कई तरह के होते हैं, जैसे मूलांक, भाग्यांक, नामाक्षर, व्यक्तिगत अंक आदि इन सभी के द्वारा आप अंक ज्योतिष में अलग-अलग तरह की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं और सभी अंक आपको भविष्य की ओर इंगित करते हैं और नई योजनाएं बनाने में सहायक होते हैं। व्यक्तिगत अंक द्वारा आप अपने मित्र और अपने शत्रु को बड़ी आसानी से पहचान सकते हैं। तो हम देखते हैं, कि व्यक्तिगत अंक क्या होते हैं।

व्यक्तिगत अंक - व्यक्तिगत अंक व्यक्ति के अपने अंक होते हैं, जिन्हें उन्हें अपने नामाक्षर के अंकों को जोड़कर स्पष्ट कर लेना चाहिए। अंग्रेजी के प्रत्येक अक्षर के लिए व्यक्तिगत अंक होते हैं। यह क्रम से 1 से 9 तक होते हैं फिर अगले अंक के लिए फिर एक अंक आ जाता है। उदाहरण के लिए A अंक 1 होगा, B का अंक 2 होगा, इस तरह क्रम से चलने पर J का अंक फिर 1 आ जाएगा, क्योंकि यह क्रम में दसवां अल्फाबेट है। इस प्रकार हर अक्षर के लिए हर अंक तय है।

अपने नाम के साथ प्रयोग करें - अल्फाबेट्स के साथ जो अंक तय होते हैं। उन अंकों के आधार पर आप अपने नाम में आने वाले अल्फाबेट्स के अनुसार सभी अंक लिख ले, इसका अर्थ यह हुआ कि आप अपने या किसी भी व्यक्ति के व्यक्तिगत अंक ज्ञात करने के लिए व्यक्ति के नाम के सभी अक्षरों को अंको में बदले और फिर उन्हें जोड़ ले। उदाहरण के लिए यदि आपका नाम अनिल है, तो आप के अक्षरों के हिसाब से अंक होंगे का , N का 5, I का 9  और L का 3 जोड़ने पर कुल 17 हुआ और उसका भी अंक 8 बनेगा इस तरह अनिल का व्यक्तिगत अंक 8 हुआ।

अपने मित्र या शत्रु को पहचाने - जिसके भी बारे में आपको पता करना है कि वह मित्र है या आप का शत्रु है या वह न तो मित्र है ना तो शत्रु है, तो उसके भी नाम के आप अक्षरों के अनुसार अंक बना ले। उन अंकों को जोड़कर उसका भी व्यक्तिगत अंक आपके पास आ जाएगा। आपका भी व्यक्तिगत अंक आपके पास है और सामने वाले व्यक्ति का भी व्यक्तिगत अंक आपके पास है। अब यह देख लीजिए कि क्या वे दोनों अंक एक है या अलग हैं। यदि वे अंक एक ही आते हैं तब तो वह व्यक्ति आपका मित्र होगा, हितेषी होगा परंतु यदि वह अंक अलग आता है, तो फिर यह देखना पड़ेगा कि क्या वह अंक आपके अंक से मित्रता रखता है या शत्रुता रखता है। इस तरह अंको की मित्रता और शत्रुता के अनुसार यह पता चल जाएगा कि सामने वाला व्यक्ति आपसे अच्छा भाव रखेगा या शत्रुता का भाव रखेगा। उसी के अनुसार आप उससे अपना व्यवहार तय कर सकते हैं और भविष्य की योजना बना सकते हैं।

आप यदि इन संख्यो के बारे में विस्तार से जानना चाहते है या अंक शास्त्र में ज्ञान आर्जित करना चाहते है, तो आप नुमेरोलोजी में हमारे सर्वश्रेठ संसथान इंस्टिट्यूट ऑफ़ वैदिक एस्ट्रोलॉजी से पत्राचार द्वारा कोर्स कर सकते है।

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Astrology By Institute of Vedic Astrology Jan 07 2020

पूजा का अर्थ

जब हमें किसी मनुष्य से बातचीत करनी होती है, तो हम भाषा का प्रयोग करते हैं और उससे सीधे सीधे बातचीत करके अपनी बात उसे समझा लेते हैं। जब हम किसी कंप्यूटर जैसीकिसीमशीनकोकमांडदेतेहै,तब हम उसके कीबोर्ड द्वारा या उसके स्विच या बटनो द्वारा उसे अपनी बात समझा लेते हैं, कि हम उससे क्या चाहते हैं। परंतु जब हमें परमात्मा से बात करनी होती है, तब हमारे पास भाषा का साधन सीधा-सीधा नहीं होता, क्योंकि परमात्मा हमें दिखाई नहीं देता। तब उस अदृश्य शक्ति तक अपनी बात पहुंचाने के लिए जो सशक्त माध्यम होता है, वह होती है पूजा। जो कार्य एक मशीन द्वारा नहीं हो सकता। वह कार्य पूजा के द्वारा हो जाता।

पूजा के विभिन्न चरण

एक सफल पूजा के लिए विभिन्न चरण होते हैं, जो कि इस प्रकार हैं।

पवित्रीकरण

पूजा विधान का कार्य पवित्रीकरण की क्रिया से प्रारंभ करते हैं। यह एक भावनात्मक क्रिया है, सर्वप्रथम पूजन के द्वारा परमात्मा का एवं प्रकृति का ध्यान करने से पहले अपने आप को मन आत्मा एवं शरीर से पवित्र करना, मनवाणी एवं शरीर द्वारा अपने को शुद्ध करना, अर्थात भावना करना, कि अब मैं अत्यंत सात्विक कर्म करने को तैयार होता हूं। एवं एकाग्र भाव उत्पन्न करता हूं, इस भावना से शरीर एवं आत्मा का पवित्रीकरण करने की विधि की जाती है।

शिखा बंधन

शिखा रखना भारतीय संस्कृति का महत्वपूर्ण अंग है। शिखा स्थान बुद्धि का वह केंद्र स्थान है, जहां से बुद्धि में सभी प्रकार के विचार उत्पन्न होते हैं। उन्हें स्पाइनल कॉर्ड के द्वारा समस्त शरीर के अंगों तक पहुंचाने का कार्य इसी स्थान से प्रारंभ किया जाता है। स्पाइनल कॉर्ड मस्तिष्क से जुड़कर मस्तिष्क के समस्त विचारों का संप्रेषण करती है। इसीलिए इस स्थान पर शिखा रखी जाती है, जो स्पाइनल कॉर्ड का बाह्य स्वरूप है और गणपति का स्वरूप है, अर्थात पूजा विधि प्रारंभ करने से पूर्व परमात्मा से प्रार्थना करते हैं।कि बुद्धि उत्तम विचारों का संप्रेषण करें पूजा का प्रत्येक सद्भाव बुद्धि द्वारा शरीर को पूर्ण रूप से प्राप्त हो।

तिलक धारण करना

पूजन करने के पूर्व तिलक की स्थापना माथे पर की जाती है। कुमकुम रोली के द्वारा अथवा चंदन के द्वारा माथे पर तिलक धारण किया जाता है। अधिकतर मंगल कार्यों में कुमकुम का ही प्रयोग होता है। कुमकुम इसलिए माथे के अग्रभाग पर लगाते हैं, क्योंकि यह हमारी बुद्धि का अग्रभाग है, जिसे वैज्ञानिक भाषा में फ्रॉम कॉल लॉग कहते हैं। योग की भाषा में इस स्थान को आज्ञा चक्र कहते हैं। इस आज्ञा चक्र को शांति प्रदान करने के लिए कुमकुम लगाया जाता है। मन में प्रश्न यह उठ सकता है, कि कुमकुम ही क्यों लगाया जाता है। वह इस कारण की कुमकुम का निर्माण हल्दी एवं चूने को मिलाकर किया जाता है। हम सभी जानते हैं, कि हल्दी औषधि के समान गुण रखती है। हल्दी को घाव पर लगा दो तो ठंडक पड़ जाती है। जले हुए पर लगा दो तो ठंडक पड़ जाती है। उस औषधि गुण आयुक्त हल्दी एवं चूने के रासायनिक मिश्रण से कुमकुम का निर्माण होता है, जो आज्ञा चक्र पर लगाने से आज्ञा चक्र को शांति एवं एकाग्रता मिलती है। इसी प्रकार चंदन भी आज्ञा चक्र को ठंडक प्रदान करता है, इस भावना से बुद्धि को शांति प्रदान करने के लिए कुमकुम एवं चंदन का लेप आज्ञा चक्र पर किया जाता है।

रक्षा सूत्र

रक्षा सूत्र शब्द से ही समझ में आता है, कि पूजा करने वाले यजमान के उस हाथ में जिसके द्वारा वह पूरी पूजन क्रिया को क्रियान्वित करेगा रक्षण एवं पवित्रता के लिए रक्षा सूत्र बांधने की परंपरा बनी हुई है।

संकल्प

जिस भी विशेष पूजा का प्रकरण होता है, उसके अनुकूल परमात्मा के सामने संकल्प लेते हुए उस पूजन को करने का एवं उससे अच्छे फल की कामना करने हेतु इस संकल्प का विधान पूजा पद्धति में किया जाता है। इसमें पूजन की तारीख दिन समय संवत एवं चंद्र एवं समस्त ग्रहों की नक्षत्र एवं राशि गत स्थिति इत्यादि का विवरण देते हुए, उस व्यक्ति से संकल्प लिया जाता है। जिसके द्वारा वह पूजा करने वाला व्यक्ति परमात्मा से प्रार्थना करता है, कि उसकी पूजा का श्रेष्ठ फल उसे एवं उसके परिवार को प्राप्त हो।

* स्वाति वचन*

अर्थात शांति पाठ वह भी एक बहुत ही सुंदर प्रथा हमारी पूजा में होती है, जो पूजा प्रारंभ करने से पहले हम शांति पाठ करते हैं। इसका तात्पर्य है, कि पूजा के पूर्व पृथ्वी पर उपस्थित सभी जड़ एवं चेतन तत्वों को शांति मिले उनका हम पर आशीर्वाद रहे और प्रकृति के तत्वों से मानवजाति प्रसन्न रहो ऐसा भाव रखकर वैदिक मंत्रों का पाठ किया जाता है। उन सभी मंत्रों का यही तात्पर्य होता है, कि सब जगह सुख शांति हो पृथ्वी पर, अंतरिक्ष में, जल में, वनस्पति में, औषधि में सभी कुछ जो ईश्वर ने ब्रह्मांड में बनाया सभी को शांति प्राप्त हो इस प्रकार और भी अनेक मंत्र होते हैं, जो प्राकृतिक तत्वों से हमें सुख प्रदान करने की भावना से लिखे गए।

गणपति स्थापना पूजन का प्रारंभ गणपति की स्थापना से ही होता है। कोई भी विशेष कार्य हो विवाह, भूमि पूजन, ग्रह प्रवेश, व्यापार प्रारंभ, लक्ष्मी पूजन अथवा ग्रहों की शांति के पूजन या और भी किसी प्रकार की पूजा हो सर्वप्रथम गणपति स्थापना की जाती है।सभी शुभ कार्यों को करने से पहले गणपति की स्थापना की जाती है, क्योंकि सभी कार्य स्वस्थ बुद्धि के द्वारा ही संभव होते हैं। अतः सर्वप्रथम गणपति जी की स्थापना कर उपासना कर परमात्मा से प्रार्थना की जाती है, कि वह हमारी बुद्धि को स्थिर करें ताकि यह शुभ कार्य संपन्न हो सके।

पंचतत्व पूजन

यह पूजन गणपति स्थापना के पहले किया जाता है, जिसमें दीप प्रज्वलन कर पूजा का प्रारंभ किया जाता है। जो कि अग्नि की पूजा करने के लिए किया जाता है। दीप प्रज्वलन का कर पूजा का प्रारंभ इसलिए किया जाता है, क्योंकि सर्वप्रथम पूजन प्रारंभ करने से पहले परमपिता परमात्मा को जो दिव्य ज्योति के स्वरूप में है या अग्नि पुंज के स्वरूप में हैं, तो उनके उसी स्वरूप को सार्थक रूप में पूजने के लिए अग्नि जलाई जाती है। दूसरा कारण यह है, कि पंचतत्व जिनसे यह मानव शरीर बनता है, उसका पहला तत्व अग्नि है, अग्नि के द्वारा ही हमारा शरीर जीवित और स्वस्थ है जठराग्नि हमारे खाए भोजन को पचाने का कार्य करती है। भोजन का पचना और शरीर का जीवित रहना इस अग्नि के बिना संभव नहीं, इसी तरह हमारे शरीर का तापमान अभी अग्नि के द्वारा ही स्थिर रहता है। अतः अग्नि हमें हमेशा स्वस्थ और जीवित रखती है, इसलिए इस अग्नि का सर्वप्रथम सम्मान किया जाता है।

कलश स्थापना

प्रत्येक पूजन विधि में कलश स्थापना अवश्य की जाती है। कलश स्थापना कर ब्रह्मांड को नारियल का स्वरूप देकर उस पर समस्त देवताओं का आव्हान किया जाता है। पांच पान के पत्ते रखे जाते हैं या आम के पत्ते रखे जाते हैं, जिसका संकेत होता है कि हमें अपनी प्रकृति को बचाना है और कलश में जल भरकर यह संकेत होता है, कि जल हमारे जीवन के लिए कितना जरूरी है।

इसी तरह के अन्य विषयों में जानने के लिए आप वैदिक ज्योतिष शास्त्र विषय में अध्यन कर सकते है। इंस्टिट्यूट ऑफ़ वैदिक एस्ट्रोलॉजी जो एक सर्वश्रेष्ठ संस्थान है, जो आपको इस तरह के विषय में आपको तीन प्रकार से कोर्स उपलब्ध करता है। जैसे वैदिक एस्ट्रोलॉजी, विडियो वैदिक एस्ट्रोलॉजी तथा कॉम्बो कोर्स और वो भी दूरस्थ पाठ्यक्रम द्वारा आपके घर बैठे आपकी इच्छा अनुसार।‍

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GEMS_HEALING_&_CRYSTAL_THERAPY By Institute of Vedic Astrology Dec 26 2019

मोती एक नाम अनेक

हिंदी में जिसे मोती कहते हैं, संस्कृत में उसे मुक्ता कहते हैं या मुक्ता फल कहते हैं, अरबी और फारसी में गौहर मौरवादीद और अंग्रेजी में पर्ल कहते हैं।

प्राप्ति स्थान

मूंगे की तरह मोती भी पत्थर ना होकर जीवो विशेष के पेट से उत्पन्न होने वाला एकशैलखंड है। मोती की उत्पत्ति के विषय में अनेक मत प्रचलित हैं, सबका सार यह है कि समुद्री सीप की एक जाति विशेष के पेट से मोती निकलता है। यह सीप शिकारियों के द्वारा पकड़ा जाता है और फिर उसे मारकर पेट चीरकर मोती निकाला जाता है। अब तो वैज्ञानिकों ने कृत्रिम मोती बनाना प्रारंभ कर दिए हैं। समुद्री सीपी पाल कर उन्हें कुछ ऐसे विशिष्ट पदार्थ खिलाए जाते हैं जो सीपी के पेट में स्थित होकर विभिन्न तत्वों से अवतरित होकर मोती के रूप में बाजार में आते हैं, किंतु सर्वश्रेष्ठ मोती वही होता है, जो प्राकृतिक रूप में सीपी के पेट से निर्मित हुआ हो और चमक बनावट की दृष्टि से निर्दोष हो।

मोती के गुण

.मोती एकऐसारत्न है, जो कई सदियों से मनुष्य को लुभाता चला आ रहा है।मोती को रोजमर्रा की जरूरतों के हिसाब से पहना जा सकता है। साथ ही मोती एक ऐसा रत्न है, जिसे पूरे समय धारण किया जा सकता है। मोती की बनावट के अनुसार मोती के उपयोग भी होते हैं। मोती चंद्रमा ग्रह का रत्न है और चंद्रमा ग्रह निश्चित रूप से मन का कारक होता है। इसलिए सीधी सी बात है, कि मोती रत्न मन पर बहुत प्रभाव डालता है। एक अच्छा मोती मन को नियंत्रित कर पूरे जीवन को व्यवस्थित कर सकता है। ऐसे लोग जिनका मन बहुत चंचल होता है और उस चंचलता के कारण यदि वे जीवन में असफल होते हैं, तब मोती सबसे बढ़िया साधन होता है। उस मन को स्थिर करने का परंतु उसके लिए चपटा मोती धारण किया जाता है। एक स्वच्छ और चपटा मोती मन को व्यवस्थित कर एकाग्र करता है।इसके लिए बसरा का चपटा मोती श्रेष्ठ होता है।

ज्योतिष के आइने में मोती

कर्क लग्न का स्वामी चंद्रमा होता है और चंद्रमा का रत्न मोती होता है। इस आधार पर चंद्र रत्न मोती कर्क लग्न वालों के लिए निर्विवाद रूप से अनुकूल सिद्ध होता है। मोती धारण करके कर्क लग्न वाले व्यक्ति बहुत कुछ लाभ की अनुभूति करते हैं। सद्विचार, दीर्घायु, बौद्धिक, संपन्नता, स्वास्थ्य, लाभ, सौंदर्य, सद्भावना और प्रणयक्षेत्र में मोती उन्हें निश्चित रूप से लाभकारी होता है। ऐसे जातक यदि आजीवन मोती पहनने रहे, तो सहसा उन्हें किसी अभाव विरोध और विसंगतियों का सामना नहीं करना पड़ता है।

मोती एक औषधि के रूप में

सौंदर्य के अनुसार तो मोती रत्न और लाभकारी होता ही है। परंतु औषधि के रूप में भी मोती बहुत लाभकारी होता है। यदि मोती नारंगी रंग का है, तो वह रक्तविकार, रक्तस्त्राव, नेत्र विका,र तिमिर रोग, वक्ष पीड़ा, शारीरिक दुर्बलता, शक्ति हास, दृष्टि दोष, वीर्य दोष और कांति हास आदि रोगों में बहुत लाभकारी औषधि के रूप में सिद्ध होता है और इस बात की पुष्टि ज्योतिष शास्त्र के साथ-साथ भौतिक शास्त्र यानी कि पदार्थ विज्ञान शास्त्र भी कर चुका है।

विशेष रोग मिर्गी में मोती

भारतीय विद्वानों ने रत्नों के विभिन्न उपयोगों का अनुसंधान किया है। उनका निष्कर्ष है, कि जिस प्रकार आयुर्वेद में रत्नों की भस्म और पीष्ठी का प्रभाव रोग निवारक होता है। उसी प्रकार रत्न को उसके मूल रूप में धारण करने से भी रोग विकार शांत होते हैं। मिर्गी के रोग में मोती रत्न चमत्कारी प्रभाव दिखाता है। भ्रम, उन्मत्ता,मौन, प्रलाप और चेतना दौरा मिर्गी जैसे उपद्रव में और उनके शमन में मोती बहुत चमत्कार करता है। मानसिक और मस्तिष्क संबंधी विकारों में मोती धारण करके रोगी जन पर्याप्त लाभ उठा सकते हैं।

मोती विभिन्न आयाम

अंक शास्त्र के अनुसार मूल अंक दो होने पर उसके स्वामी ग्रह चंद्रमा के अनुकूल रत्न मोती पहनने पर लाभ प्राप्त होता है। साथ ही जब वर्णों के अनुसार रत्नों का विभाजन किया जाता है, तो वैश्य वर्ण के लिए मोती रत्न उपयोगी होता है। इसका अर्थ यह हुआ कि व्यापारी वर्ग यदि मोती धारण करता है और विशेषकर सबसे छोटी उंगली में यदि मोती पहनते हैं, तो व्यापारी वर्ग के लिए यह बहुत लाभकारी सिद्ध होता है। वैवाहिक अवसर पर वधु को मोती का उपहार दिया जाना कल्याणकारी होता है। वैसे भी मोती शांति दायक है, इसे धारण करने से व्यक्ति की मानसिक.अस्थिरता, उलझन, उत्तेजना, शुष्कता दूर हो जाती है यह रत्न ज्वर और मस्तिष्क की।उष्णता को शांत करके तन मन को निरोग व शीतल बनाता है।

सभी लग्न और मोती

मेष लग्न वाले जातकों का चंद्रमा कुंडली के चतुर्थ भाव में विराजमान होता है, यह एक शुभ स्थिति है। उधर मेष लग्न का स्वामी मंगल है, जो चंद्रमा का मित्र है। इस प्रकार मेष लग्न से चंद्रमा को सहयोग मिलता है। ऐसे लोग मोती धारण करके चंद्रमा और मंगल दोनों की कृपा प्राप्त करते हैं। वृषभ लग्न वालों को मोती नहीं पहनना चाहिए। मिथुन लग्न वाले जातक के लिए मोती का प्रभाव आने का होता है, उसे यह रत्न धारण नहीं करना चाहिए। कर्क लग्न का स्वामी चंद्रमा है, इस आधार पर चंद्र रत्न मोती कर्क लग्न वालों के लिए निर्विवाद रूप से अनुकूल सिद्ध होता है। मोती धारण करके कर्क लग्न वाले व्यक्ति बहुत कुछ लाभ की अनुभूति करते हैं। सिंह लग्न वाले जातकों के लिए मोती हानि-कार होता है। अतः उन्हें नहीं पहनना चाहिए। कन्या लग्न वाला व्यक्ति को मोती रत्न विविध प्रकार के भौतिक सुख उपलब्ध कराता है। ऐसे व्यक्ति यश, कीर्ति, मान-सम्मान, संतान-सुख और अर्थ लाभ अवश्य प्राप्त करते हैं। तुला लग्न वालों को मोती धारण करना वर्जित है। चंद्रमा की स्थिति वृश्चिक लग्न वालों के लिए अनुकूल रहती है, अतः चंद्र रत्न मोती उन्हें शुभ फल देता है। ऐसे ऐसे लोग जो वृश्चिक लग्न में जन्मे हो, मोती धारण करके जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में व्यवसाय, धन, उपार्जन, यात्रा, आध्यात्मिक क्षेत्र में लाभ उठाते हैं। धनु लग्न वालों को मोती नहीं पहनना चाहिए। मकर लग्न वालों को भी मोती नहीं पहनना चाहिए। कुंभ लग्न वालों को भी मोती विशेष फलदाई नहीं होता है, परंतु मीन लग्न वालों को मोती पहनने से लाभ मिलता है।

इसी तरह के अन्य रत्नो के बारे में जानने के लिए आप हमारे संसथान इंस्टिट्यूट ऑफ़ वैदिक एस्ट्रोलॉजी से जेम्स एंड क्रिस्टलथेरेपी में पत्राचार द्वारा अध्यन कर सकते है।

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Astrology By Institute of Vedic Astrology Dec 19 2019

कन्या राशि वालों का पंचमी शनि

गोचर क्या है।

हम सभी जानते हैं, कि पृथ्वी के साथ-साथ सभी ग्रह सूर्य का चक्कर लगाते हैं। यही गोचर कहलाता है। चंद्रमा सबसे तीव्र गति से परिक्रमा करता है और शनि सबसे धीमी गति से परिक्रमा करता है। इसी गति को समझने के लिए मनुष्य ने जन्म कुंडली का निर्माण किया और उसमें 12 खाने बनाए। इन 12 खानों को भाव कहते हैं और एक राशि में किसी ग्रह के रहने का समय और फिर अगली राशि में जाने को उसका गोचर कहते हैं। चंद्रमा सबसे एक राशि से दूसरी राशि 2.15 दिन में पहुंच जाता है। जबकि शनि ग्रह को एक राशि से दूसरी राशि तक जाने में ढाई वर्ष लगते हैं।

शनि ग्रह

ऐसे तो शनि ग्रह बड़ा लाभदायक रहता है, परंतु वह बहुत धीमा चलने वाला होता है और धीमी गति से परंतु स्थाई लाभ देता है। जब शनि ग्रह नाराज हो जाता है या फिर कष्ट देता है तो वह अत्याधिक कष्ट देता है। जनसाधारण में शनि की साढ़ेसाती बहुत प्रचलित है, क्योंकि साढ़ेसाती में पूरे साढे सात वर्ष कष्ट के ही बीते हैं, परंतु शनि की एक स्थिति ऐसी भी होती है। जो भी जो साढ़ेसाती के बराबर ही कष्ट देती है और वह स्थिति होती है चंद्र लग्न से पंचम स्थान का शनि इसे कहते हैं पंचमी शनि और कर्नाटक में एक कहावत है कि पंचमी शनि फूटे मटके में खाना खिलाता है।

पंचमी शनि कैसे कष्ट देता है

कर्नाटक प्रदेश में साढ़ेसाती से अधिक दर पंचम शनि का मानते हैं। शनि जब पंचम भाव में हो, तो उसकी दृष्टि धन दौलत के दोनों भागों अर्थात द्वितीय तथा एकादश पर पड़ती है। साथ ही व्यापार के स्थान सप्तम भाव पर भी इस कारण उनका यह डर भी निर्मल नहीं। जब मनुष्य के धन भाव और लाभ भाव पर संकट आता है, तो निश्चित रूप से उसे बहुत कष्ट प्राप्त होता है। साथ ही पंचम स्थान में स्थित शनि की दृष्टि सातवें भाव पर पड़ती है। जो कि व्यापार का भाव है और दांपत्य जीवन का भाव है। व्यापार पर संकट आना मनुष्य पर के जीवन पर संकट आने जैसा होता है। साथ ही दांपत्य जीवन में मतभेद होना और भी कष्टकारी बात होती है।

पंचमी शनि कौन-कौन से कष्ट देता है।

24 जनवरी 2020 को शनि मकर राशि में प्रवेश करेगा और कन्या राशि वालों के लिए यह शनि पंचमी शनि रहेगा। तो अगले ढाई वर्षों तक कन्या राशि वालों को कुछ परेशानियां हो सकती है, परंतु यदि अभी से उपाय किए जाएं। तो शनि कष्ट नहीं देगा, अन्यथा शनि धन की हानि करता है साथ ही आय को कम करता है। जीवनसाथी से वैचारिक मतभेद देता है। समाधान इस संकट से बचने के लिए बहुत सारे उपाय और समाधान हमारे पास हैं, परंतु उनको समझने के पहले हम शनि ग्रह के स्वभाव को समझते हैं। शनि ग्रह ऐसा ग्रह होता है, जो पहले व्यसनों के लिए उकसाता है, परंतु बाद में वही दंड भी देता है। तो हम इस सब से बचने के लिए यह उपाय करें, कि इस छोटी ढहिया के दौरान व्यसनों का त्याग कर दें। साथ ही यदि कहीं बाहर जाना पड़े, तो अपने साथ घर से भोजन लेकर चले, साथ ही पानी भी लेकर चले। जहां तक संभव हो इसके साथ ही यदि किसी रिश्तेदार के घर भोजन करना पड़े। तो किसी ना किसी रूप में उस भोजन की कीमत अदा कर दे। इस अवधि में ना तो किसी से लोहा दान में लें और ना ही किसी को लोहा दान करें और ना ही लोहा खरीदें। जहां तक संभव हो अपाहिजओं को कंबल का दान करें और यदि वह विधवा हो और साथ ही अपाहिज भी हो तो अति उत्तम।

प्रभावशाली उपाय

शनि की इस छोटी ढैया के दौरान दान करने वाली जो वस्तुएं होती है। वह काला उड़द, तेल, नीलम, काला तिल, कुलथी, भैंस, लोहा बर्तन के रूप में, दक्षणा, काला कपड़ा आदि पदार्थों का दान, शनि ग्रह की प्रसन्नता के लिए करना चाहिए। साथ ही शनि की स्तुति का मंत्र

नीलांजन समाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम ।
छाया मार्तंड संभुतम तम नमामि शनिश्चरा।।

इस मंत्र की स्तुति करने से शनिदेव प्रसन्न होते हैं। साथ ही मंत्र के जप करने से जो कि दो प्रकार के मंत्र हैं पहला है।

“ओम शं शनिश्चराय नमः” और दूसरा “ओम प्राम प्रीम प्रौम स शनिश्चराय नमः” साथ ही विशेष रूप से शिवपूजन, हनुमंत पूजन और महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें।

इसी तरह के कई विषयो के बारे अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए आप हमारे सर्वश्रेठ संसथान इंस्टिट्यूट ऑफ़ वैदिक एस्ट्रोलॉजी से ज्योतिष शास्त्र में दूरस्थ पाठ्यक्रम द्वारा अध्ययन कर सकते है। जो आपको इसे अध्ययन करने के तीन प्रकार के कोर्स उपलब्ध करता है, जैसे वैदिक ज्योतिष शास्त्र, वीडियो द्वारा वैदिक ज्योतिष शास्त्र और कॉम्बो कोर्स

 

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VASTU By Institute of Vedic Astrology Dec 12 2019

हमारे जीवन में पौधों की भूमिका

सबसे पहले यह पृथ्वी आग का गोला थी फिर यह ठंडी हुई और इतनी ठंडी हुई कि फिर इस पर सबसे पहले वनस्पति उगना प्रारंभ हुई और उसके बाद जीव जंतु आए और अंत में मनुष्य शायद इसीलिए मनुष्य को आज भी मैं वनस्पतियों और प्रकृति से बहुत प्रेम है क्योंकि वह उन्हीं का एक हिस्सा है वनस्पति में भी कुछ पौधे जंगली होते हैं परंतु कुछ पौधे लाभकारी होते हैं वह आपके मन को भी खुशी देते हैं और आपके शरीर को स्वास्थ्य देते हैं साथी आपके घर का वातावरण उर्जा माई बना देते हैं

पौधे कुछ कहते हैं

जब हम घर बनाते हैं तब हमें यह नहीं पता चलता कि हमें कौन से पौधे लगाने हैं तो हमें जो पौधे मिल जाते हैं हम उन पौधों को ही लगा लेते हैं परंतु सभी पौधे शुभ नहीं होते हैं कुछ पौधे जैसे नागफनी या कैक्टस बहुत कांटेदार पौधे हमारे घर के लिए भी शुभ नहीं होते हैं और हमारे मन की स्थिति के लिए भी शुभ नहीं होते हैं इसके स्थान पर फूलदार रसिया खुशबू वाले वृक्ष हमारे मन को भी सुकून पहुंचाते हैं और हमारे घर के वातावरण में एक नई ऊर्जा लाते हैं तू हम समझते हैं कि कौन से पौधे लगाना चाहिए और कौन से पौधे नहीं लगाना चाहिए

चमत्कारी पौधे

कुछ पौधे घर की सकारात्मक ऊर्जा के लिए चमत्कारी सिद्ध होते हैं परंतु उन्हें किस दिशा में लगाना यदि इस बात का भी ध्यान रख लिया जाए तो और अधिक शुभ होता है घर की उत्तर दिशा में पौधों का रोपण करना शुभ होता है परंतु तुलसी को घर की सीमा में कहीं भी लगाना शुभ होता है पूर्णांक अशोक मोलश्री शमी तिलक चंपा अनार पीपली डाक अर्जुन गंभीर सुपारी कटहल केतकी मालती कमल चमेली मल्लिका नारियल केला एवं पाटन वृक्षों से सुशोभित घर लक्ष्मी का विस्तार करता है

अशोक वृक्ष

अपनी सगन सुखदाई नहीं छाया के द्वारा इस वक्त ने जिस प्रकार मां सीता के दुख को कम किया था ठीक उसी प्रकार इस वृक्ष के कई ऐसे औषधीय उपयोग हैं जो कि स्त्रियों में होने वाली व्याधियों को काफी हद तक करने में सक्षम है अशोक की छाल में टैनिन तथा कटे चिन्ह नामक रसायन पर्याप्त मात्रा में होते हैं जो कि औषधीय महत्व के हैं अशोक से निर्मित अशोकारिष्ट नामक औषधि बहुत गुणकारी है अशोक के बीजों को दो माशा चूर्ण को जल के साथ नित्य कुछ दिनों तक लेने से अश्वरी रोग चला जाता है अशोक के वृक्ष के नीचे स्नान करने वाले व्यक्ति की ग्रह जनित बाधाएं दूर होती हैं मंदबुद्धि स्मृति लोक के शिकार एवं ऐसे जातक जिनकी पत्रिका में बुध ग्रह नीच का हो उनके लिए अशोक वृक्ष के नीचे स्नान करना अत्यंत शुभ कार्य है

केला

केले का वृक्ष लगाना हर तरह से सुखदाई होता है जहां एक और केले के पत्ते पर भोजन किया जा सकता है थाली के रूप में वहीं पर दूसरी ओर पका हुआ केला शीतल वीर्य वर्धक शरीर के लिए पुष्टि दायक मांस को बढ़ाने वाला भूख प्यास को दूर करने वाला तथा नेत्र रोग और प्रमेह नाशक होता है पेट के कीड़े मारने तथा खून शुद्ध करने के लिए केले केले की जड़ के अर्क का सेवन लाभदायक है केले की अर्क को बनाने के लिए लगभग 1 किलो जल में 50 ग्राम केले की जड़ डालकर इतना गर्म करें कि जल की मात्रा आदि हो जाए इसके बाद इस मिश्रण को  96 यही छना हुआ जल केले का अर्थ है

पीपल

किसी भी घर में पश्चिम में पीपल वृक्ष का होना अत्यंत शुभ है ज्योतिष शास्त्र की मान्यता है कि शनि ग्रह से पीड़ित व्यक्ति को शनिवार के दिन पीपल के वृक्ष की जड़ में जल चढ़ाने से पर्याप्त शांति प्राप्त होती है पीपल की परिक्रमा करने से देवता प्रसन्न होते हैं तथा ग्रहों का कुप्रभाव नहीं रहता है

अपने जीवन या संबंधित लोगों के इन तत्वों और पहलुओं के बारे में अधिक जानने के लिए आप IVA से वैदिक वास्तु के विषय में ऑनलाइन अधययन कर सकते हैं। आप भी एक कुशल ज्योतिष बन सकते है, अगर आप किसी प्रतिष्ठित संसथान से वैदिक ज्योतिष विषय में अध्यन करते है, तो जैसे  इंस्टिट्यूट ऑफ़ वैदिक एस्ट्रोलॉजी

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Astrology By Institute of Vedic Astrology Dec 05 2019

भूमिका

प्रकृति ने मनुष्य को छठी इंद्री के रूप में मन का उपहार दिया है। इस सौगात के बलबूते पर मनुष्य कई अनसुलझी पहेलियां भी सुलझा लेता है और कई रहस्यों से पर्दा भी उठा सकता है।  उनमें से एक गुण यह है कि वह शुभ या अशुभ को देखकर उनके मूलभूत कारणों का पता भी लगा सकता है| शायद यही वजह है, कि ज्योतिष शास्त्र के आधार पर जीवन में होने वाले कष्ट देखकर राहु के अशुभ होने की बात पता लगा सकते हैं|

स्थितियां कष्टों के अनुसार अशुभ राहु -

जीवन में जब कष्ट आते हैं, तो उनके कारण अशुभ ग्रह होते हैं। अलग-अलग ग्रहों के अशुभ होने पर अलग-अलग प्रकार के कष्ट मिलते हैं। हम राहु की विभिन्न अशुभ स्थिति को उनके परिणामों द्वारा समझते हैं।

  1. यदि जीवन में सुख की हानि है या अपमान मिल रहा हो या परिवार से समाज से अपमान मिल रहा हो तो समझना चाहिए कि राहु जन्म कुंडली में अशुभ होकर लग्न में बैठा है।
  2. यदि जातक को धन हानि हो रही हो, खास कर स्थाई या पैतृक संपत्ति की हानि से नुकसान हो या व्यापार में धन हानि हो या जातक की वाणी में क्षोभ हो या वाणी में कटुता कहीं गई हो या कुटुम से वियोग या विरोध हो तब उस स्थिति में राहु अशुभ होकर द्वितीय भाव अर्थात धन भाव में बैठा होता हैl
  3. यदि जातक के परिवार में कलह - क्लेश बढ़ गया हो या उसके मन में दुख निराशा हो या कृषि या संपदा की हानि हो रही हो, तो निश्चित रूप से अशुभ राहु चौथे भाव अर्थात माता के भाव में स्थित है।
  4. यदि जातक की बुद्धि भ्रमित होने के कारण हानि हो रही हो या उसे सबके प्रति कु विचार आते हो या वह कुसंगति में पड़ गया हो या उसे पुत्र या मित्रों से दुख व क्लेश मिल रहा हो या उसके हर कार्य में बाधा आती हो तो समझना चाहिए कि अशुभ राहु पंचम भाव में स्थित हैl
  5. यदि जातक के अपनी पत्नी से मतभेद हो या उसके दांपत्य जीवन में तनाव हो या उसके साथ अलगाव की स्थिति हो तो निश्चित रूप से अशुभ राहु सप्तम भाव अर्थात विवाह स्थान में स्थित है ।
  6. यदि जातक को हर क्षेत्र में अपमान मिल रहा हो या हर कार्य में असफलता वह अपयश मिल रहा हो या उसके पद से उसे कई बार अब अवनति मिलती हो या उसे महान शारीरिक कष्ट उठाने पड़ते हो तो ऐसे में जन्म कुंडली में अशुभ राहु अष्टम भाव अर्थात मृत्यु के स्थान में स्थित होता है l
  7. यदि जातक के अपने पिता से मतभेद या विरोध होते हो या गुरुजन से विरोध होते हो या उसके भाग्य में बाधा या हानि होती है, तो उस स्थिति में राहु अशुभ होकर नवम भाव अर्थात भाग्य स्थान में स्थित है।
  8. यदि जातक के आपस में खर्चे बढ़ गए हो या उसे अनावश्यक जुर्माना भरना पड़ रहा हो या दंड का भागी बन रहा हो या उसे शारीरिक पीड़ा अधिक हो या उसकी बंधन की स्थितियां हो तो निश्चित रूप से अशुभ राहु द्वादश भाव अर्थात बारहवें स्थान में स्थित है।

निष्कर्ष- इस प्रकार जातक के जीवन में मिलने वाले परिणामों से राहु के अशुभ या शुभ होने के संकेत मिलते हैं।

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