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Astrology By Institute of Vedic Astrology Mar 23 2020

    पेड़-पौधे ना केवल हमारे वातावरण को स्वस्थ और साफ़ बनाते बल्कि हमारे जीवन में भी इनका काफी गहरा प्रभाव होता है। कई पेड़ और पौधे हमारे जीवन में सकारात्मक और कभी नकारात्मक प्रभाव भी डालते है। वही यदि बात है अपने ऊपर बैठे क़र्ज़ की तो व्यक्ति को जरुरत है अपने जीवन में कुछ सकारात्मक बदलाव करने की कई बार छोटे-छोटे बदलाव बड़ी से बड़ी चीजों का समाधान निकाल देते है। वही एक छोटा सा बदलाव हम ला सकते है हमारे आँगन या घर में कुछ ख़ास वृक्ष या पौधे लगा कर जिसकी सकारात्मक उर्जा आपके जीवन में अच्छे बदलाव ला सकती है, और आपको अपने क़र्ज़ से मुक्ति दिलवाने में सहायता भी प्रदान कर सकती है।  
एक आम व्यक्ति कई बार अपनी मजबूरियों के चलते क़र्ज़ में डूब जाता है, जिसका प्रभाव उसके नीजी जीवन के साथ व्यक्तिगत जीवन पर भी पड़ता है। ऐसा कहाँ जाता है, की यदि किसी व्यक्ति ने ज्योतिष के अनुसार समय तय करे बिना किसी प्रकार का कर्जा लिया तो उसे आगे कई प्रकार की परेशानियों का सामना उठाना पड़ता है। कई लोगो के पास पैसा होता है पर फिर भी वह अपना क़र्ज़ नही उतार पाते हैं क्योकि उनका पैसा ना बच पाता है ना ही टीक पाता है।  
यहाँ हम आपको कुछ ऐसे वृक्षों के बारे में जानकारी देंगे जिससे आप क़र्ज़ मुफ्त होने के साथ-साथ अपने जीवन में अलग बदलाव भी महसूस करेंगे।  

1. नारियल का पेड़-  

नारियल का पेड़ वातावरण के लिए ही नहीं किंतु किसी भी व्यक्ति के स्वास्थ्य और उसके रोजाना खान पान के काम में भी आता है। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि पेड़ ना केवल हमें छांव प्रदान करता है परंतु यह हमें चिकित्सा संबंधी फल भी प्रदान करता है। लेकिन यहां यह जानना भी दिलचस्प होगा कि किस प्रकार अपने घर में नारियल का पेड़ या वृक्ष लगाने से आप अपने कर्ज से मुक्ति पा सकते हैं।
हिंदू मान्यताओं व हिंदू धर्म के अनुसार नारियल के बगैर तो कोई मंगल कार्य संपन्न नहीं माना जाता। किसी भी हिंदू घर में पूजा के दौरान कलश में पानी भरकर उसके ऊपर नारियल को रखा जाता है।
यदि आप नारियल का वृक्ष अपने घर में लगाते हैं तो इससे आपको कई सकारात्मक फायदे भी हो सकते हैं। यदि आपका कारोबार में लगातार घाटा हो रहा है तो गुरुवार के दिन एक नारियल में सवा मीटर का पीला कपड़ा लपेट कर एक जोड़ा जनेऊ सवा पाव मिष्ठान के साथ आसपास के किसी भी विष्णु मंदिर में अपने संकल्प के साथ चढ़ाएं इससे आपको व्यापार में तत्काल लाभ होगा जिससे आप जल्द से जल्द अपने कर्ज से मुक्ति पा सकेंगे।

2. पीपल का पेड़ -

यदि आप अपने कर्ज से छुटकारा पाना चाहते हैं तो किसी पीपल के पेड़ में शमशान के कुए से जल लकर चढ़ाएं। यह कार्य नियमित 7 दिन तक हर शनिवार करने से आपको जल्द फायदा पहुंचेगा इसी के साथ यदि आपके आसपास कहीं शमशान नहीं हो तो आप पीपल के वृक्ष के नीचे हर शनिवार दीया जला सकते हैं।

3. केले का पेड़-

हर व्यक्ति को केले जैसा फल खाना पसंद होता है, जिससे उसका स्वास्थ्य भी अच्छा होता है और उसी के साथ यह तो हम सभी जानते हैं कि दक्षिण भारत के लोग अपनी मान्यताओं व परंपरा के अनुसार अपना भोजन खासतौर पर केले के पेड़ के पत्तों में ही खाना पसंद करते हैं। क्योंकि वैज्ञानिक तौर पर भी यह सिद्ध हो चुका है कि इसके कई स्वास्थ्य संबंधी फायदे हैं। केले का पेड़ काफी पवित्र भी माना जाता है और इसका उपयोग कई किस्म के धार्मिक कार्यों में भी किया जाता है। यदि आप अपने कर्ज से तुरंत मुक्ति चाहते हैं और घर में समृद्धि चाहते हैं तो गुरुवार को केले के पेड़ की पूजा करें उसी के साथ तुलसी और केले का पौधा घर में रखने से आपके घर व आय में बरकत भी होगी।

4. आंवले का पेड़-

यदि आप लंबे समय से कर्ज से मुक्ति पाना चाहते हैं तो आंवले का पेड़ यहां आपकी सहायता अवश्य कर सकता है। आमतौर पर आंवले का पेड़ लोगों के घर में नहीं पाया जाता है, परंतु अगर आप इसे अपने घर में लगाते हैं तो इसका आपके जीवन में सकारात्मक प्रभाव भी पड़ सकता है। आंवले के पेड़ की पूजा आंवला नवमी के दिन तो होती ही है, परंतु यदि आप इसे कर्ज मुक्ति के लिए इस्तेमाल करते हैं तो अपने घर में इसका पेड़ लगाएं या आसपास इसका पेड़ ढूंढें यदि वह पेड़ उत्तर या पूरब की दिशा में हो तो यह बड़ा लाभकारी होता है। आंवले का पेड़ भी आपको कष्टों से निवारण दिलवा सकता है।

5. बरगद का पेड़-

यदि आपके घर में बरगद का पेड़ है तो रोजाना आप उसके नीचे दिया जलाकर अपनी सुख समृद्धि की कामना कर सकते हैं। यदि आपके घर या आसपास बरगद का पेड़ नहीं है तो आप किसी मंदिर में इसे ढूंढ सकते हैं और वहां हर मंगलवार दीया जलाकर किसी भी पीपल के वृक्ष के नीचे रख सकते हैं। इस उपाय से आपको आपके जीवन में कर्ज से छुटकारा मिल जाएगा। बरगद का पत्ता लेकर उसे अश्लेषा नक्षत्र में अपने घर के अन्न भंडार में रखे इससे आपको काफी फायदा होगा। 

अधिक क़र्ज़ मुक्ति उपायों के बारे में जानने हेतु आप हमसे जुड़े रहे और अपने जीवन में आसन समाधान पाए इंस्टिट्यूट ऑफ़ वैदिक एस्ट्रोलॉजी के द्वारा।  
 
 

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vastu By Institute of Vedic Astrology Mar 11 2020

घर छोटा हो यहाँ बड़ा, लेकिन हर व्यक्ति अपने घर में कुछ आसान व सरल उपाए कर अपने जीवन और आमदनी में बदलाव ला सकता है। आप सोच रहे होंगे वह कैसे? किन्तु यह सत्य है की व्यक्ति अपनी रोज़ाना की दिनचरिया में कुछ आसान बदलाव ला कर अपने आँगन में भी धन की बरसात कर सकता है। मेहनत करने के साथ-साथ जरूरत है हर व्यक्ति को अपने जीवन और घर में कुछ मुख्य बदलाव करने के जिसके साथ व्यक्ति का मानसिक एवं आर्थिक विकास भी होता जाए। लेकिन यह किस तरह संभव है?

वास्तु एक ऐसी कला और शास्त्र है जिसके जरिये व्यक्ति अपने घर में सामान्य बदलाव कर नीजी एवं व्यक्तिगत जीवन में आसानी से बदलाव ला सकता है।

आये जानते है कुछ आसन और सरल वास्तु शास्त्र से जुड़े कुछ उपाए जिससे आपके जीवन में बदलाव आएगा उसी के साथ आपके घर धन की भी वृद्धि होगी।

  • ऐसा माना जाता है कि आपके घर का प्रवेश द्वार, जब वास्तु के अनुसार बनाया जाता है, तो सुख और समृद्धि ला सकता है। प्रवेश द्वार के लिए उत्तर या पूर्व दिशा को आदर्श माना जाता है। प्रवेश द्वार के लिए सागौन की लकड़ी का उपयोग करना लाभदायक साबित सकता है।
    सकारात्मक वातावरण के लिए, सुनिश्चित करें कि प्रवेश द्वार अव्यवस्था मुक्त हो और स्थानांतरित करने के लिए पर्याप्त जगह भी घर में मोजूद हो। घर के मुख्य दरवाजे के आसपास जूते-चप्पल या अन्य व्यर्थ सामान न छोड़ें, क्योकि यह आपके घर में प्रवेश ले रही सकारात्मक उर्जा के प्रभाव को कम कर देते है।

 

  • घड़ियां वे उपकरण हैं जो वास्तु के अनुसार दिशाओं को सक्रिय करते हैं। सुनिश्चित करें कि आपके घर की सभी घड़ियां चालु और काम करने की स्थिति में हो। यह कहा जाता है कि धीमी या गैर-कार्यात्मक घड़ियाँ आपके घर धन आने में देरी या ठहराव का प्रतीक हैं। वास्तु के अनुसार घड़ियों को उत्तर या उत्तर-पूर्व दिशा में रखने से धन और समृद्धि आती है।

 

  • पक्षी सद्भाव, धन और आनंद का प्रतीक हैं। धन और सकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करने के लिए, अपने बागीचे या बालकनी में पक्षियों के खाने के लिए अनाज व पीने के लिए पानी कटोरे रख सकते है। जिससे आपके घर और जीवन में बदलाव आना निश्चित है।

 

  • आपके घर में दर्पण/आईने का स्थान महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह आपके घर में सकारात्मक ऊर्जा को प्रवेश करने की अनुमति दे सकते हैं या रोक सकते हैं। वास्तु के अनुसार, अपनी तिज़ोरी या धन रखने के स्थान पर एक दर्पण रखने से आपके घर धन की वृद्धि होगी। दूसरी ओर, टूटे हुए दर्पण, घड़ी या इलेक्ट्रॉनिक उपकरण से बचना चाहिए क्योंकि यह धन के रास्ते में बाधा बनते हैं।

 

  • आप अपने घर के बहार मनी प्लांट पोधा भी रख सकते है, (जिसे घर के अंदर भी रखा जा सकता है) यह आपके घर में समृद्धि और सौभाग्य लाने में भी काम आ सकता हैं। वास्तु के अनुसार मनी प्लांट को उत्तर दिशा में हरे फूलदान में रखने से धन और बेहतर करियर के अवसरों को आकर्षित करने में मदद मिलती है। यहां तक ​​कि बांस का पौधे, हरे-भरे जंगलों के चित्र भी अपने घर में लगा सकते है, जिससे उर्जा का सही प्रभाव बना रहे।

    यह थे कुछ वास्तु से जुड़े आसान उपाए जिससे बिना किसी परिवर्तन व पैसा खर्च किये आप अपने घर में धन में वृद्धि ला सकते हैं।

अधिक वास्तु ज्ञान लेने हेतु आप भी वास्तु सीख सकते है, बड़ी ही आसानी से घर बेठे, वास्तु सीखने हेतु सबसे अच्छी संस्थान द्वारा, इंस्टिट्यूट ऑफ़ वैदिक एस्ट्रोलॉजी के माध्यम से, और आप भी अपने घर के वास्तु विशेषज्ञ बन अपने जीवन में सटीक बदलाव ला सकते है।

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Astrology By Institute of Vedic Astrology Mar 09 2020

जैसा कि हम सभी बचपन से सुनते आ रहे हैं, कि होली का त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाया जाता है होली के दिन होली का दहन के रूप में पवित्र अग्नि जलाई जाती है, जिसमें अहंकार बुराई नफरत और नकारात्मकता को जलाया जाता है। लेकिन यह सभी बातें तो हम बचपन से सुनते चले आ रहे हैं और जानते भी हैं लेकिन आखिर क्यों होली हमारे जीवन में महत्वपूर्ण है, और किस तरह से होली का त्यौहार व्यक्ति के जीवन में महत्व रखता है यह बात हम यहां आपको बताएंगे।

होली का धार्मिक दृष्टि से बहुत बड़ा महत्व माना गया है। देश के लगभग प्रत्येक भाग में यह त्यौहार मनाया जाता है परंतु इसी के साथ यह हमारे जीवन पर भी कई तरह से प्रभाव डालता है। वर्ष भर में आने वाली कुछ मुख्य रातों व त्यौहारों में से सबसे महत्वपूर्ण व पवित्र त्यौहार वरात होलिका दहन भी माना गया है जिसमें सभी धार्मिक अनुष्ठान जाप मंत्र पाठ और सिद्धि होती है जिससे मन के साथ-साथ आत्मा की भी शुद्धि होती है। इन सभी प्रकार के अनुष्ठान व क्रिया करने से किसी भी व्यक्ति को जीवन भर इसका फल प्राप्त होता है।

अगर आप किसी भी परेशानी से गुजर रहे हैं तो धीरज रखें उनमें राम क्योंकि होली करीब है और ज्योतिष शास्त्र में कुछ ऐसे उपायों के बारे में बताया गया है अपनाने से भविष्य में आने वाली और वर्तमान में चल रही परेशानियों से छुटकारा मिलने की संभावना बड़ जाएगी। व्यक्ति होलिका माता से अपनी परेशानी और समस्याओं का निवारण करने की कामना व प्रार्थना कर सकता है और उस समय व्यक्ति के मन में किसी के प्रति बैर नहीं होना चाहिए।

कैसे करें अपनी बाधाओं का समाधान?

होली की अग्नि सभी प्रकार के शारीरिक, मानसिक और आर्थिक समस्याओं से लड़ने की ताकत हमें प्रदान करती है। जिससे सफलता में रुकावट आर्थिक कष्ट और कई प्रकार की अला-बला हमसे दूर रहती है।
विभिन्न तरह के प्रयोगों से हम हमारे जीवन में समस्याओं व परेशानियों का निवारण होलिका दहन व कुछ अनुष्ठान करके पा सकते हैं।
किसी भी प्रकार की क्रिया व प्रयोग करने के पश्चात हमें शुद्धता पवित्रता का विशेष तौर पर ध्यान रखना चाहिए। इसी के साथ कोई भी क्रिया करने के समय हमें गोपनीयता अवश्य बनाए रखनी चाहिए।

करें यह उपाय-

-होलिका दहन करने के पूर्व स्नान कर शुद्ध और स्वच्छ कपड़े धारण करें।
-एक श्रीफल ले और उसे अपने परिवार के सदस्यों के ऊपर से 7 बार घड़ी की सुई की दिशा में उतारे। यदि घर के किसी व्यक्ति को सामान्य से ज्यादा तकलीफ है यहां परेशानी है तो उस व्यक्ति के लिए अलग से श्रीफल उतारें।
-यह क्रिया करने के बाद अपने इष्ट देवता का ध्यान कर अपनी समस्या उन्हें बताकर श्रीफल को होलिका की पवित्र अग्नि में डाल दें।
-7 पद प्रदक्षिणा करके परेशानी दूर करने की प्रार्थना करें एवं अपने परिवार जनों के लिए स्वास्थ्य, खुशहाली, दीर्घायु, धन और लाभ की कामना करें।

यह प्रयोग करने के पश्चात और इसके प्रभाव से भगवान की कृपा आप पर होगी और सारी आपकी जीवन से संबंधित समस्याएं धीरे-धीरे कम होने लगेंगी। आपकी समस्याएं व परेशानी होली की अग्नि में भस्म हो जाएगी तथा आपका जीवन सुगम सुखमय समृद्धिशाली हो जाएगा।

भारतीय त्योहारों व धार्मिक दिनों के बारे में और जानकारी व दिलचस्प तथ्य जानने के लिए हमारे इंस्टिट्यूट ऑफ़ वैदिक एस्ट्रोलॉजी जुड़े रहे।


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Astrology By Institute of Vedic Astrology Mar 06 2020

     हमारे देश में महिला और बेटियों को देवी का स्थान दिया गया हैं। इतना ही नही हमारे देश में महिला ना केवल घर के कार्यों में बल्कि हर जगह अपना नाम आगे रखती है, शिक्षा के क्षेत्र से लेकर, खेल में और कार्यक्षेत्र में भी वह पुरुषो से आगे निकल जाती है। पर क्या आप जानते है उन्हें गृहलक्ष्मी क्यों कहा जाता हैं? हर कन्या विवाह के बाद गृहणी बनती है, उसे के साथ उसे गृहलक्ष्मी के पद पर भी बैठाया जाता है।

एक महिला ही है, जो मकान को घर और घर से उसे स्वर्ग बनाने की काबिलियत रखती है। हमारी भारतीय सभ्यता में महिला को घर की शोभा माना जाता हैं जिसके बिना घर, घर नही होता। एक महिला ही जानती है के किस प्रकार घर को सुन्दर और व्यवस्थित रखना है। घर को सजाने-सँवारने में सबसे महत्वपूर्ण योगदान महिलाओं का होता है। कहा जाता है कि ऑफिस हो या घर, जहाँ भी पुरुषों के साथ महिलाएँ आ जाती हैं वहाँ चीजें खुद-व-खुद व्यवस्थित हो जाती हैं। हर व्यक्ति चाहता है, की उसका घर स्वर्ग सा सुन्दर हो भले उसमे हर सुख सुविधा ना भी हो, और उसे चंद चीजों के साथ स्वर्ग बनाने का काम करती है एक गृहणी। यदि हम ज्योतिष के अनुसार देखें कि किस प्रकार एक महिला घर को स्वर्ग बनाती है या ग्रहणी से गृहालक्ष्मी बनती है तो उसका सफर काफी लंबा होता है। यह निश्चित होता है उस समय जब वर और वधु की कुंडलियां एक दूसरे से मिलती हैं या एक दूसरे से मेल खाती हैं। यदि दोनों व्यक्तियों के नक्षत्र व ग्रहों में सही से मेल मिलाप बन जाता है तो विवाह के पश्चात वधू के ग्रह और नक्षत्र मुबारक के घर में बदलाव व सकारात्मक उर्जा भी अपने साथ लेकर आती है। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि जब भी हमारे घर में कोई नया व्यक्ति आता है तो वह अपने साथ नई उर्जा व खुशहाली लेकर आता है उसी प्रकार से एक ग्रहणी अपने साथ घर में खुशहाल वातावरण और सुख व समृद्धि साथ लाती है। यही नहीं कई बार यह भी होता है कि जिस घर में उस ग्रहणी के कदम पढ़ते हैं वहां धन की वर्षा भी हो जाती है। शायद इसीलिए ग्रहणी को गृह लक्ष्मी याने की घर की लक्ष्मी भी कहा जाता है। इसी के साथ महिला अपने घर में प्रेम व सद्भावना भी कायम रखती है। वह घर को सुंदर ही नहीं बल्कि प्रेम से भरा भी देती है।
 

एक मकान एक व सीमेंट से बन जाता है पर वह घर बनता है प्रेम से और उस प्रेम को बनाए रखने की सबसे मजबूत कड़ी एक ग्रहणी ही होती है। 

यदि आप भी ज्योतिष से जीवन से जुडी कुछ और बातों को जानना चाहते है तो, इंस्टिट्यूट ऑफ़ वैदिक एस्ट्रोलॉजी से ज्योतिष से जुडी बातें सीखे और जाने।

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FengShui By IVAINDIA Feb 29 2020

फेंग शुई एक चीनी विज्ञान और कला है जो वातावरण में सद्भाव लाता है। फेंग शुई आपके लिए धन नहीं लाता है, यदि आप इसके लिए प्रयास नहीं करते हैं, लेकिन यह आपको अपने धन और भाग्य की तलाश करने के लिए सहायता प्रदान करता है। फेंग शुई आपके घर और कार्यालय में सकारात्मक वातावरण बनाने के लिए विभिन्न तरीकों से मदद करता है। जिस उर्जा से आपको धन प्राप्त करने में आसानी होगी।

धन प्राप्त करने के लिए फेंग शुई के कई उपाए हैं, जैसे प्राचीन फेंग शुई इलाज में चीनी सिक्के, ड्रैगन कछुआ, लाफिंग बुद्धा, मनी प्लांट, धन जहाज और बहुत कुछ शामिल हैं। इन वस्तुओं का उपयोग सदियों से घर और कार्यालय में धन को आकर्षित करने के लिए किया जाता है।
चलिए जानते है, कुछ आसन तरीके जिससे आप अपने जीवन और व्यवसाय में धन की प्राप्ति फेंग शुई को अपना कर सकते हैं।

-एक मजबूत मुख्या दरवाज़ा बनाना महत्वपूर्ण है। क्योंकि आपका घर धन को आकर्षित करने के लिए सकारात्मक उर्जा के निर्माण में सक्षम होना चाहिए। मुख्य दरवाज़े का मुख किस ओर है, यह भी ध्यान रखना आवश्यक है, या दरवाज़े के आस पास कुछ अनावश्यक चीज़े का पड़ी हो।

उदाहरण के लिए, पास में कोई रिसाइकिलिंग डिब्बे या पुराने बर्तन नहीं हों। इसके अलावा, निश्चित करें कि आपका मुख्य दरवाज़ा बिना किस आवाज़ के खुले।

- अपने फेंग शुई मनी क्षेत्र का पता लगाएँ और इसकी बहुत अच्छी देखभाल करें। यह एक ऐसा स्थान है जहाँ धन रखने पर धन की आवत होती हो। आमतौर पर, यह आपका घर कार्यालय है जहां आप वित्त और अन्य काम का प्रबंधन करते हैं। आप लकड़ी जैसे तत्वों को शामिल कर सकते है, जो धन और धन का प्रतिनिधित्व करते है। नदी, सागर, पानी के तत्वों के चित्र लगा सकते है, या उससे जुडी चीज़े घर में उपयोग कर सकते है जैसे, पिछली का पॉट, इत्यादि। आप आईने, पौधों और छोटे प्रतीकों का भी उपयोग कर सकते हैं जो समृद्धि का प्रतीक हैं।

- अपने घर में फेंग शुई प्रतीकों को प्रदर्शित करें जो धन के होने या धन से सम्बंधित संकेतों के संकेत देते हैं। आप विभन्न प्राचीन प्रतीकों का उपयोग कर सकते हैं
, जैसे कि धन का जहाज, या आपके धन ऊर्जा के प्रतिनिधित्व। सोने का एक स्पष्ट रंग है, जो सीधे रूप से धन की ओर संकेत करता है। आप सोने के रंग का उपयोग अपने घर और कार्यालय के आसपास के चित्रों, तकियों, आसनों और अन्य वस्तुओं में कर सकते हैं।

अधिक फेंग शुई उपायों के लिए आप भी फेंग शुई सीख सकते है। इंस्टिट्यूट ऑफ़ वैदिक एस्ट्रोलॉजी एक ऐसी संस्थान है, जो आपको पत्राचार के माध्यम से फेंग शुई कोर्स उपलब्ध कराते है। अब आप भी फेंग शुई सीखे और धन प्राप्त करने के नए तरीके जाने।

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Mahashivratri By Institute Of Vedic Astrology Feb 21 2020

भारत देश वैसे तो धर्म एवं आस्था के प्रतीक के रूप में पूरे विश्व में विख्यात है। भारत देश त्योहारों के देश के नाम से भी पूरे विश्व में जाना जाता है। भारतीय संस्कृति एवं सनातन धर्म में कई रीति-रिवाजों को महत्व दिया गया है एवं उनके अनुसार पर्व त्योहारों की परंपरा अनादि काल से चली आ रही है। सत्य सनातन धर्म में भगवान शिव को बहुत अधिक महत्व दिया गया है एवं उन्हें देवाधिदेव के नाम से भी जाना जाता है। भगवान शिव ही हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार एक ऐसे देव हैं जो बहुत शीघ्र ही प्रसन्न हो जाते हैं एवं अपने भक्तों की समस्त मनोकामनाएँ पूरी करते हैं एवं मनोवांछित फल प्रदान करते हैं। उन्हें किसी भी प्रकार के छद्म, छलावे या आडंबर की आवश्यकता नहीं है, वह भक्त के भक्ति भाव को ही समझ कर अपना पूजन स्वीकार करते हैं।
भक्तों द्वारा उन्हें विभन्न प्रकार के नाम से उत्पादित कर पुकारा जाता है, जैसे भोले शंकर, वाघ अंबर, महादेव, देवाधिदेव इत्यादि| सभी प्रकार से वे जाने जाते हैं एवं कल्याणकारी देवता के रूप में सनातन धर्म में माने जाते है।

वैसे तो प्रत्येक माह में एक शिवरात्र‍ि होती है, परंतु फाल्गुन माह की कृष्ण चतुर्दशी को आने वाली इस शिवरात्र‍ि का अत्यंत महत्व है, इसलिए इसे महाशिवरात्र‍ि कहा जाता है। वास्तव में महाशिवरात्र‍ि भगवान भोलेनाथ की आराधना का ही पर्व है, जब धर्मप्रेमी लोग महादेव का विधि-विधान के साथ पूजन अर्चन करते हैं और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। इस दिन शिव मंदिरों में बड़ी संख्या में भक्तों की भीड़ उमड़ती है, जो शिव के दर्शन-पूजन कर खुद को सौभाग्यशाली मानती है।

महाशिवरात्र‍ि के दिन शिव जी का विभिन्न पवित्र वस्तुओं से पूजन एवं अभिषेक किया जाता है और बेलपत्र, धतूरा, अबीर, गुलाल, बेर, उम्बी आदि  अर्पित किया जाता है। भगवान शिव को भांग बेहद प्रिय है अत: कई लोग उन्हें भांग भी चढ़ाते हैं। दिनभर उपवास रखकर पूजन करने के बाद शाम के समय फलाहार किया जाता है। 

वैसे तो शिवरात्रि का पर्व हर मास में कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी में माना जाता है, किंतु सत्य यह है की, सनातन धर्म में दो शुभरात्रि को बहुत अधिक महत्व दिया गया है, एक शिवरात्रि जो श्रावण कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी में आती है एवं देती फाल्गुन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी जो महाशिवरात्रि के नाम से भी जानी जाती हैं। फाल्गुन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाने वाली शिवरात्रि को महाशिवरात्रि के नाम से भी जाना जाता है एवं इस महाशिवरात्रि के संबंध में पुराणों आदि में कई प्रचलित कथाएं एवं प्रसंग उपलब्ध है। आइए इन प्रसंगों की विस्तार से चर्चा करते हैं एवं जानते हैं महाशिवरात्रि का महत्व और उसको मनाने के पीछे की वजह।


(1) पुराणों के अनुसार महाशिवरात्रि को भगवान शिव के अवतरण दिवस या उद्भव दिवस के रूप में भी जाना जाता है। शिव संप्रदाय आदि की मान्यताओं एवं पुराणों के अनुसार इस दिन भगवान शिव की उत्पत्ति मानी जाती है एक मुख्य कारण यह भी है इसी कारणवश फाल्गुन कृष्ण पक्ष चतुर्दशी को महाशिवरात्रि के रूप में मनाया जाता है।

(2) शिव महापुराण में विदित है कि समुद्र मंथन के समय जहां एक और रत्न आभूषण, एरावत, हाथी आधी रत्न संपदा निकली थी वही सर्व ज्ञात है कि उसी में से कालकूट नामक विश्व भी उत्पन्न हुआ था जिसके कारण तीनो लोक में हाहाकार मच गया था एवं सृष्टि खतरे में आ गई थी उसी समय देव दानव यक्ष गंधर्व किन्नर आदि सभी प्राणी भगवान शिव की स्तुति करने लगे एवं उन्हें अपनी रक्षार्थ के हेतु पुकारने लगे वह समय संध्याकाल का था जिस समय कालकूट विष समुद्र के गर्भ से बाहर आया था एवं सभी प्राणियों द्वारा भगवान शिव की स्तुति संध्या वेला से प्रारंभ हो चुकी थी एवं उस स्थिति के अनंतर चलने तक एवं स्तुति काल के मध्य रात्रि के निश्चित काल तक चलने तक भगवान शिव वहां प्रकट नहीं हुए थे निश्चित काल की अवस्था में भगवान शिव ने वहां प्रकट उस कालकूट नामक विश्व का सेवन किया था एवं वह रात्रि चतुर्दशी की रात्रि थी इसी कारणवश उसे महाशिवरात्रि का नाम भी दिया गया। उसी विश्व के प्रभाव से भगवान शिव के कंठ में नीला पना गया एवं उस विष के कारण ही उन्हें अत्यधिक जलन एवं सिर में तपन महसूस होने लगी जिस कारणवश उन्होंने सर्पों की माला गले में धारण की एवं चंद्रमा को अपने मस्तक पर शोभायमान किया उसी कारणवश सभी प्राणियों के द्वारा उनका विवेक उपचारों द्वारा पूजन किया गया एवं तभी से महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाने लगा।

(3) एक अन्य घटना के अनुसार जब भगवान श्री ब्रह्मा जी एवं भगवान श्री हरि विष्णु जी के बीचवर्चस्व को लेकर भयंकर एक बिछड़ गया एवं दोनों ने यह विवाद जारी हुआ कि उनमें से श्रेष्ठ कौन है एवं युद्ध की स्थिति निर्मित हो गई तभी दोनों के मध्य एक विशालकाय अग्नि पुंज उत्पन्न हो गया उस अग्नि पुंज के देश को देखकर भगवान श्री हरि विष्णु जी एवं भगवान श्री ब्रह्मा जी आश्चर्यचकित हो गए तभी भगवान महादेव ने दोनों देव से कहा कि यदि आप दोनों में से कोई भी इस अग्नि पुंज का आदि या अंत मुझे पता करके बता देगा तो मैं उसे श्रेष्ठ समझ लूंगा पूर्णविराम इसी प्रकार जब भगवान महादेव की इस प्रकार की वाणी दोनों देशों ने सुनी तब वे इस अग्नि पुण्य का आदि एवं अंत खोजने हेतु निकल पाए भगवान श्री हरि विष्णु जी ने शुक्र का रूप धारण किया एवं वे पाताल लोक की ओर गमन घर गए इसी प्रकार भगवान श्री ब्रह्मा जी ने हंस का रूप धारण कर गगन की ओर प्रस्थान किया एवं दोनों अपने-अपने लक्ष्य की ओर बढ़ चले। भगवान श्री हरि विष्णु जी थक हार का वापस लौट आए एवं हाथ जोड़कर भगवान श्री महादेव के सामने उपस्थित हुए एवं उनसे कहने लगे कि हे प्रभु मैं इस अग्नीपथ के अंत का पता लगाने में अक्षम मुझे क्षमा कर दीजिए एवं इसी प्रकार जब भगवान श्री ब्रह्मा जी वापस लौटे तो उन्होंने हाथ में केतकी का फूल धारण कर रखा था एवं भगवान महादेव के सम्मुख उपस्थित होकर वे कहने लगे कि मैं इस अग्नि पंच के चोर का पता लगा चुका हूं एवं यह केतकी का फूल इसका प्रमाण है भगवान श्री महादेव तंत्रिका लगे त्रिकालदर्शी आदि अनादि अनंत हैं उन्हें सबूत था उन्हें सब ज्ञात था वह भगवान श्री ब्रह्मा जी के स्मिता वचन मित्र वाणी से बहुत ही कुपित हुए एवं क्रोध आवेग में उन्होंने अपने त्रिशूल से भगवान श्री ब्रह्मा जी के एक मस्तक को काट दिया एवं केतकी के पुष्प को भी छाप दिया कि तुम सभी प्रकार के पूजा उपासना कर्म में उपेक्षित रहोगे एवं वर्जित रहोगे उस समय से भगवान श्री ब्रह्मा जी 3 मस्तक के कहलाने लगे एवं जिस समय अग्निपंख की उत्पत्ति हुई थी उसी समय से महाशिवरात्रि का पर्व मनाने लगा एवं सभी देवी देवता द्वारा उनके इस अनादि अनंत रूप का  गुणगान किया जाने लगा एवं तभी से यह प्रथा प्रचलन में है।

(4) एक अन्य घटना के अनुसार जो प्राचीन काल से विदित है एवं सर्वमान्य है एवं शिव भक्तों में बड़े ही विख्यात है जिसमें या माना गया है कि फाल्गुन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन भगवान श्री महादेव एवं मां पार्वती का विवाह संपन्न हुआ था इसी दिन मध्यरात्रि के निश्चित काल में भगवान श्री महादेव एवं मां गौरा पार्वती ने एक दूसरे का वरण किया था एवं सात फेरे लेकर एक-दूसरे जीवनसाथी के रूप में चुना था। सभी से यह कथा प्रचलन में है एवं इस रात्रि को महाशिवरात्रि का नाम भी दिया गया है एवं इस काल को बड़ा महत्व दिया गया है जो सभी शिव भक्तों में बहुत ही विख्यात है एवं मान्यता के अनुसार इस कार्य में भगवान शिव का पूजन विशेष रूप से फलदाई होता है जो भगवान शिव के द्वारा बहुत ही एवं मनोवांछित फलों को प्रदान करने वाला माना जाता है।

(5) लिंगा पुराण के अनुसार भगवान शिव के द्वारा अग्नि बनाए गए अग्नि पुंज से ही सृष्टि का निर्माण हुआ जतिन सृष्टि का अग्नि पुण्य के द्वारा निर्माण किया गया था वहां फाल्गुन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी होती एक वजह यह भी है कि इस दिन को महाशिवरात्रि के रूप में एवं सृष्टि की उत्पत्ति के रूप में भी मनाया जाता है एवं इस दिन भगवान श्री महादेव द्वारा सृष्टि का उत्सर्जन किया गया था यह कथा भी बहुत प्रचलन में है।

उपरोक्त सभी घटनाओं का वर्णन हमारे प्राचीन ग्रंथों एवं पुराणों में पाया जाता है एवं सभी में यह विदित है कि फाल्गुन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को सभी घटनाओं का वर्णन माना जाता है इसलिए इस दिन को महाशिवरात्रि के रूप में मनाया जाता है एवं सभी घटनाएं महादेव के साक्ष्य प्रमाण होने के रूप में भी लिया जाता है तभी से महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जा रहा है।

अन्य हिन्दू धार्मिक त्योहारों से जुड़ी बाते जानने हेतु इंस्टिट्यूट ऑफ़ वैदिक एस्ट्रोलॉजी https://www.ivaindia.com/ जुड़े रहे|

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Astrology By Institute of Vedic Astrology Feb 11 2020

विवाह क्या है?

भारतीय संस्कृति में अपने वंश को आगे बढ़ाने के लिए और समृद्ध करने के लिए विवाह की एक शुभ परंपरा है जिसमें दो व्यक्तियों को एक मधुर बंधन में बांधा जाता है इस बंधन में बंद कर दो व्यक्ति एक साथ जीवन व्यतीत करते हैं, एक साथ सुख-दुख बांटते हैं, और मिलजुलकर  परिवार की व्यवस्थाएं संभालते हैं, पति-पत्नी परिवार रूपी गाड़ी के दो पहिए होते हैं यदि एक भी रुक जाए तो परिवार रूपी गाड़ी आगे नहीं बढ़ती जिन व्यक्तियों का दांपत्य जीवन खुशहाल होता है, वे अपने जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी अच्छी प्रगति करते देखे गए हैं। किसी कारण से यदि दांपत्य जीवन खुशहाल नहीं होता है तो उसमें घबराने वाली कोई बात नहीं होती उससे बहुत सरल उपायों द्वारा खुशहाल बनाया जा सकता है।

दांपत्य सुख हेतु ज्योतिषी उपाय-

जीवन में असंतुष्ट दांपत्य अनेक समस्याओं की जड़ होता है, जिससे विभिन्न प्रकार के तनाव एवं बाधाएं उपस्थित होती हैं दांपत्य जीवन को सहज सरल और मधुर बनाने के लिए यह कुछ उपाय हैं-

1 प्रदोष के दिन गुड़ का शिवलिंग बनाकर उसकी विधि पूर्वक पूजा करने से दांपत्य जीवन में सौहार्द बढ़ता है।

2 प्रतिदिन सुंदरकांड का पाठ करना चाहिए सुंदरकांड का पाठ शुक्ल पक्ष के किसी भी मंगलवार से प्रारंभ किया जा सकता है 3.चावल मिश्री दूध सुगंधित वस्तुएं दही और सफेद पशु दान करने से दांपत्य जीवन मधुर बनता है।  

4.दांपत्य जीवन शुक्र को प्रबल करने से मधुर बनता है उसके लिए सत्संगति करना, कला में रूचि पैदा करना, और एकांत का त्याग करना आवश्यक है।

5 स्फटिक की माला से इस मंत्र का 11000 बार जप करने से और उसके बाद बेसन के लड्डू का प्रसाद बांटने से लाभ होता है मंत्र है- “ओम ह्रीं सः”।  

6 तुलसी की माला से निम्नलिखित मंत्र का 18 बार जप करने के बाद माला को बहते जल में प्रवाहित करने से लाभ होगा मंत्र है- “ओम ह्रीं सः” यदि पति-पत्नी के मध्य अकारण ही तनाव उत्पन्न हो रहा हो, तो दांपत्य जीवन को सुखमय बनाने के लिए निम्नलिखित मंत्र का लाल चंदन की माला से 21000 जाप करने चाहिए और जाप के बाद माला को स्वयं धारण कर लेना चाहिए -"ओम क्ल क्लोम क्रीम नमः”

व्रत एवं दान से दांपत्य सुख प्राप्ति के उपाय-

जिन स्त्रियों को दांपत्य सुख में स्थायित्व चाहिए, वह गुरुवार का व्रत विधि पूर्वक करें गुरुवार के व्रत में इन नियमों का पालन आवश्यक है। व्रत को शुक्ल पक्ष के गुरूवार से प्रारंभ करें व्रत वाले दिन केले के वृक्ष की पूजा करें गुड़ और चने का भोग लगाएं, तथा भगवान विष्णु की आराधना करें और भगवान को पीले पुष्प अर्पित करें, गुरुवार को पीले रंग के वस्त्र धारण करें तथा खाने में पीली वस्तुओं का उपयोग करें गुरु मंत्र- “ॐ बृहस्पताऍ नमः” का जाप करें किसी ब्राह्मण को भोजन कराकर दक्षिणा दें।  तथा सुखी दांपत्य जीवन हेतु आशीर्वाद प्राप्त करें, इस दिन झूठ बोलने और पाप कर्मों से दूर रहें।

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FengShui By Institute of Vedic Astrology Feb 07 2020

     इससे पहले कि आप कुछ भी सीखें आपको मूलभूत रूप से उस विषय के बार में पता होना चाहिए ताकि आपको उस विषय के बारे में मूल ज्ञान हो। फेंग शुई भी उन्ही विषयों में से एक है, आईऐ जानिए की फेंग शुई के बारे की उसे कैसे सीखा जा सकता है और घर में उसका उपयोग क्या है।

फेंगशुई क्या है?

कई लोगों के लिए, यह शब्द नया और दिलचस्प है, ज्यादातर भारतीयों के लिए। तो, आइए इस शब्द के बारे में विचार करें। अंग्रेजी में फेंग शुई का अर्थ है “हवा-पानी”। फेंग शुई एक चीनी प्राचीन कला और विज्ञान है जो मनुष्यों के लिए अनुकूल और लाभकारी तरीके से घर की प्रकृति और ऊर्जा से जुड़ा है। फेंगशुई के विशेषज्ञों का दावा है, कि फेंग शुई के कुछ सरल और आसान नियमों का पालन करके ही हमारे घर में हम सकारात्मक और शुभ वातावरण का निर्माण कर सकते है।

फेंग शुई के विशेष नियमों के अनुसार इमारते,  मकान,  कार्यालय और स्थान व्यवस्था को डिजाइन करने की एक चीनी प्रणाली है जो ऊर्जा के प्रवाह से संबंधित है।

आजकल, दुनिया भर में कई लोग फेंगशुई का पालन करते हैं और उसमे विश्वास करते हैं,  क्योंकि इसके इस्तेमाल के बाद लोगो को जीवन में सही परिणाम देखने को मिले| भारत और भारत के बाहर फेंग शुई सीखने के लिए सबसे अच्छी जगह इंस्टिट्यूट ऑफ़ वैदिक एस्ट्रोलॉजी है। यह संस्थान पूरी कोर्स अवधि के दौरान आपका मार्गदर्शन करेगा और आपको फेंग शुई के क्षेत्र में विशेषज्ञ बनने में सहायता भी करेगा।

फेंगशुई सीखने के फायदे-

  • यह आपके घर में सकारात्मक प्रवाह उत्पन्न करने में मदद करेगा और पर्यावरण को शुद्ध करने में भी सहायता करेगा।
  • फेंगशुई घर में सुख और समृद्धि लाने में मदद करता है।
  • यह आपके घर के वातावरण को शुद्ध और ताज़ा बनाने में मदद करता है।
  • यदि आप अपने घर में किसी भी तरह के दुख का सामना कर रहे हैं या नकारात्मक वातावरण की तलाश कर रहे हैं तो आप इससे छुटकारा पाने के लिए फेंग शुई सिद्धांतों को लागू कर सकते हैं।
  • यह आपको पानी, प्रकाश और हवा से संबंधित ऊर्जा को बनाए रखने में मदद करेगा।
  • फेंग शुई आपके परिवार को नकारात्मकता मुक्ति प्राप्त करने और मन और आत्मा को सकारात्मक बनाने में मदद करेगा।
  • आप IVA से फेंग शुई सीखकर भी फेंग शुई में अपना करियर शुरू कर सकते हैं और पेशेवर रूप से काम करेंगे।

  फेंग शुई जैसे विषय बहुत ही रोचक और आसानी से सीखने वाले होते हैं, जिसमें केवल कुछ सिद्धांत, उपकरण और तकनीक शामिल हैं, जिन्हें आपको अपने घर या रहने की जगह पर लागू करना है। निर्माण, डिजाइनिंग और सजावट में उन सिद्धांतों को लागू करने के बाद, आप अपने घर को सकारात्मक बना सकते हैं और बुरी ऊर्जाओं से मुक्त हो सकते हैं, जो हमारे निकट वातावरण में मौजूद हैं।

 बहुत से लोग केवल अपने घरों पर बैठकर नई चीजें सीखना पसंद करते हैं क्योंकि वे किसी कॉलेज या संस्थान से बाहर नहीं जाना चाहते हैं। समय और अन्य अनुसूची बहुत से लोगों को अपने जीवन में विभिन्न चीजों को सीखने की अनुमति नहीं देती है।

घर में फेंग शुई सम्बन्धी उपकरण लगाना नया चलन है। कुछ लोग अपने घर में फेंग शुई का उपयोग सिर्फ इसलिए करते हैं क्योंकि वे इसे किसी तरह से पसंद करते हैं, और उन्हें फेंग शुई दिलचस्प लगता है, लेकिन दूसरी ओर, बहुत से लोग अपने घर को शुद्ध और सकारात्मक बनाने के लिए इसका प्रयोग करते है।

कैसे सीखें फेंगशुई?

अगर आप कुछ भी नया सीखना चाहते हैं तो आपको इसे हमेशा शुरू से सीखना चाहिए। बहुत से लोग अपने जीवन में अलग और अनोखी चीजें सीखना चाहते हैं, इसलिए फेंग शुई सीखना आपको सभी से अलग और अलग बना देगा।

आपके घर पर फेंग शुई सीखने के लिए कई विकल्प उपलब्ध हैं, इंटरनेट की मदद से आप घर बैठे ही कुछ भी सीखना बहुत आसान हो गया था। सीखना अब सीखने के विभिन्न तरीकों से बहुत आसान और सुविधाजनक हो गया है।

फेंग शुई सीखने का सबसे अच्छा तरीका किताबों के साथ है और इंस्टीट्यूट ऑफ वैदिक एस्ट्रोलॉजी के पास सरल भाषा से तैयार किये गए मॉड्यूल्स के साथ फेंगशुई सीखने के लिए सबसे अच्छी अध्ययन सामग्री है। आज ही फेंग शुई सीखे और अपने घर को सबसे अलग बनाये।

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VASTU By Institute of Vedic Astrology Jan 21 2020

हमारे घर में जिस प्रकार हर एक कमरे का अपना महत्व है उसी प्रकार से पूजा घर / मंदिर भी हमारे घर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। भारतीय पद्धति के अनुसार भी मंदिर घर में एक महत्वपूण स्थान रखता है, जहाँ विभिन्न देव व देवियों को स्थान दिया जाता है और उन्हें हर रोज़ पूजा जाता है, जिससे घर में शान्ति, समृद्धि और धन का आगमन होता है। 

घर में मंदिर एक पवित्र स्थान है जहाँ हम भगवान की पूजा करते हैं। इसलिए, स्वाभाविक रूप से, यह एक सकारात्मक और शांतिपूर्ण स्थान होना चाहिए। मंदिर क्षेत्र जब वास्तु शास्त्र के अनुसार रखा जाता है तो घर और वहां रहने वालों के लिए स्वास्थ्य, समृद्धि और खुशी ला सकता है। हालांकि एक अलग पूजा कक्ष आदर्श होगा, यह हमेशा महानगरीय शहरों में संभव नहीं है, जहां जगह की कमी सामान्य रूप से पायी जाती है। 

आईए जानते हैं मंदिर और घर में मंदिर के स्थान से जुड़ी कई मुख्य बातें जैसे किस स्थान पर हो मंदिर की स्थापना, किस दिशा में मंदिर बनाना है उचित? पौराणिक और शास्त्रीय मान्यता के अनुसार भगवान की पूजा और मंदिर का स्थान घर के एकांत स्थान में उत्तर - पूर्व के कोने में ही हो, जिसे ईशान कोण कहते है, किन्तु अज्ञानतावश कई लोग अपने शयन कक्ष में ही भगवान का स्थान स्थापित कर देते है जो कि सर्वथा अनुचित है। 

शंका व समाधान- 

किसी के घर में यदि परिस्थितिवश मास्टर बेडरूम के अलावा कोई स्थान नही है, तो वह व्यक्ति या तो रसोई के उत्तर पूर्व के कोने में मंदिर स्थापित करें किन्तु भारत ही नहीं अपितु विदेशों में भी ऐसी परिस्थिति परिवारों में देखी गयी है, जहाँ केवल एक ही कक्ष में भोजन शयन और बैठक बनायीं जाती है। शौचालय या तो कॉमन होता है या जंगल का प्रयोग करते है।

जिन व्यक्तियों के पास एक कक्ष के अलावा दूसरा कक्ष नहीं है उन व्यक्तियों की परिस्थितियों के अनुसार मंदिर अथवा पूजा स्थान के बारे में गहन अनुसन्धान से यह स्पष्ट हुआ की वह मनुष्य या परिवार अपने उसी कक्ष के इशान कोण में किसी भी विधि द्वारा अपने इष्ट देव का चित्र स्थापित कर सकते है।

प्राण प्रतिष्ठित मूर्ति, धातु, पत्थर, लकड़ी एवं रत्न आदि की मूर्ति उस स्थान पर न रखे, यदि गलती से रखें हो तो उन्हें मंदिर या किसी धर्माचार्य को सौप देनी चाहिए, जिससे उसकी विधिवत पूजा की जा सके। 

मंदिर से सम्बन्धित कुछ विशेष बातें- 

- प्रत्येक व्यक्ति को इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए की वह अपने आवासीय परिसर के अन्दर कभी गलती से भी सार्वजनिक मंदिर, शिवालय स्थापित न करे।  
- जिन घरों में स्थायी शिवालय देवालय या मंदिर होते है और नियमित पूजा-अर्चना नहीं होती वह परिवार निश्चित तौर पर घोर कष्टों को पातें है।
 
- जिन व्यक्तियों के घर मंदिर के आसपास हो या वह में मंदिर रहते हों, वो लोग भी बड़े धर्म संकट का शिकार बनते हैं, क्यूंकी ग्रहस्ति में सभी कुछ होता है, अतः वे लोग जहाँ तक संभव हो सके दूर जाने का प्रयास करें।
 
- जिन देवताओं के हाथ में दो से ज्यादा अस्त्र हों, ऐसी तस्वीरें और मूर्तियां भी मंदिर में न रखें। वास्तु के अनुसार इसे भी अशुभ माना जाता है।

वास्तु सम्बंधित आगे जानकारी लेने हेतु हमारे ब्लॉग पढ़ते रहे साथ ही हमारी संस्थान इंस्टिट्यूट ऑफ़ वैदिक एस्ट्रोलॉजी के साथ सीखें वैदिक वास्तु पत्राचार शिक्षा विडिओ कोर्स के माध्यम से घर बैठे कभी भी कहीं भी। आज ही सीखें वास्तु और बने वास्तु विशेषज्ञ।

 

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NUMEROLOGY By Institute of Vedic Astrology Jan 17 2020

अंक विज्ञान क्या है -सभ्यता का पहला मापदंड अंक है, क्योंकि जीवन में जो कुछ भी घटित हुआ है, हो रहा है या होगा। उसे व्यक्त करने के लिए भाषा के बाद हमें अंको का ही सहारा लेना पड़ेगा। किसी भी परिणाम का प्रारंभ और अंत अंक ही है। यद्धपि यह निश्चित है, कि अंक विज्ञान विश्व का सर्वाधिक प्राचीन व उन्नत विज्ञान है, पर आज के युग में जिस गति से मानव के निकट आया है। उसे ध्यान में रखते हुए यह कहा जा सकता है, कि अंक ही आज के मानव का सर्वाधिक विश्वस्त मित्र है। उसका सहचर है, सुख-दुख का संभागीय सहायक है, पथ प्रदर्शक है और पूर्णता सक्षम है। आप भले ही इसे छोड़ दें पर यह आपके निकट है। आपके जीवन का प्रत्येक क्षेत्र अंक शास्त्र से बंधा है। इसके द्वारा आप यह जान सकते हैं, कि आज का दिन आपके लिए कैसा है या अगला सप्ताह क्या होने वाला है और आपको क्या करना चाहिए। हमारा पूरा जीवन ही अंको का जीवन है, उदाहरण के लिए यदि किसी व्यक्ति की जो जन्म तारीख होती है। वह जन्म तारीख उसे बहुत प्रिय होती है। वह उसके जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग बन जाती है, साथ ही उसके परिवार वालों के लिए भी वह बड़ी महत्वपूर्ण हो जाती है और वह तारीख व्यक्ति के जीवन में उत्साह का अनुभव देती है। इसलिए हम यह सब याद रखते हैं, कि हमारी शादी कब हुई, हमारी नौकरी कब लगी, हमारी पढ़ाई कब पूरी हुई या हमारे घर में कौन सा शुभ कार्य किस तारीख को हुआ था।

अंक विज्ञान में अंकों के प्रकार - अंक विज्ञान में अंक कई तरह के होते हैं, जैसे मूलांक, भाग्यांक, नामाक्षर, व्यक्तिगत अंक आदि इन सभी के द्वारा आप अंक ज्योतिष में अलग-अलग तरह की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं और सभी अंक आपको भविष्य की ओर इंगित करते हैं और नई योजनाएं बनाने में सहायक होते हैं। व्यक्तिगत अंक द्वारा आप अपने मित्र और अपने शत्रु को बड़ी आसानी से पहचान सकते हैं। तो हम देखते हैं, कि व्यक्तिगत अंक क्या होते हैं।

व्यक्तिगत अंक - व्यक्तिगत अंक व्यक्ति के अपने अंक होते हैं, जिन्हें उन्हें अपने नामाक्षर के अंकों को जोड़कर स्पष्ट कर लेना चाहिए। अंग्रेजी के प्रत्येक अक्षर के लिए व्यक्तिगत अंक होते हैं। यह क्रम से 1 से 9 तक होते हैं फिर अगले अंक के लिए फिर एक अंक आ जाता है। उदाहरण के लिए A अंक 1 होगा, B का अंक 2 होगा, इस तरह क्रम से चलने पर J का अंक फिर 1 आ जाएगा, क्योंकि यह क्रम में दसवां अल्फाबेट है। इस प्रकार हर अक्षर के लिए हर अंक तय है।

अपने नाम के साथ प्रयोग करें - अल्फाबेट्स के साथ जो अंक तय होते हैं। उन अंकों के आधार पर आप अपने नाम में आने वाले अल्फाबेट्स के अनुसार सभी अंक लिख ले, इसका अर्थ यह हुआ कि आप अपने या किसी भी व्यक्ति के व्यक्तिगत अंक ज्ञात करने के लिए व्यक्ति के नाम के सभी अक्षरों को अंको में बदले और फिर उन्हें जोड़ ले। उदाहरण के लिए यदि आपका नाम अनिल है, तो आप के अक्षरों के हिसाब से अंक होंगे का , N का 5, I का 9  और L का 3 जोड़ने पर कुल 17 हुआ और उसका भी अंक 8 बनेगा इस तरह अनिल का व्यक्तिगत अंक 8 हुआ।

अपने मित्र या शत्रु को पहचाने - जिसके भी बारे में आपको पता करना है कि वह मित्र है या आप का शत्रु है या वह न तो मित्र है ना तो शत्रु है, तो उसके भी नाम के आप अक्षरों के अनुसार अंक बना ले। उन अंकों को जोड़कर उसका भी व्यक्तिगत अंक आपके पास आ जाएगा। आपका भी व्यक्तिगत अंक आपके पास है और सामने वाले व्यक्ति का भी व्यक्तिगत अंक आपके पास है। अब यह देख लीजिए कि क्या वे दोनों अंक एक है या अलग हैं। यदि वे अंक एक ही आते हैं तब तो वह व्यक्ति आपका मित्र होगा, हितेषी होगा परंतु यदि वह अंक अलग आता है, तो फिर यह देखना पड़ेगा कि क्या वह अंक आपके अंक से मित्रता रखता है या शत्रुता रखता है। इस तरह अंको की मित्रता और शत्रुता के अनुसार यह पता चल जाएगा कि सामने वाला व्यक्ति आपसे अच्छा भाव रखेगा या शत्रुता का भाव रखेगा। उसी के अनुसार आप उससे अपना व्यवहार तय कर सकते हैं और भविष्य की योजना बना सकते हैं।

आप यदि इन संख्यो के बारे में विस्तार से जानना चाहते है या अंक शास्त्र में ज्ञान आर्जित करना चाहते है, तो आप नुमेरोलोजी में हमारे सर्वश्रेठ संसथान इंस्टिट्यूट ऑफ़ वैदिक एस्ट्रोलॉजी से पत्राचार द्वारा कोर्स कर सकते है।

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Astrology By Institute of Vedic Astrology Jan 07 2020

पूजा का अर्थ

जब हमें किसी मनुष्य से बातचीत करनी होती है, तो हम भाषा का प्रयोग करते हैं और उससे सीधे सीधे बातचीत करके अपनी बात उसे समझा लेते हैं। जब हम किसी कंप्यूटर जैसीकिसीमशीनकोकमांडदेतेहै,तब हम उसके कीबोर्ड द्वारा या उसके स्विच या बटनो द्वारा उसे अपनी बात समझा लेते हैं, कि हम उससे क्या चाहते हैं। परंतु जब हमें परमात्मा से बात करनी होती है, तब हमारे पास भाषा का साधन सीधा-सीधा नहीं होता, क्योंकि परमात्मा हमें दिखाई नहीं देता। तब उस अदृश्य शक्ति तक अपनी बात पहुंचाने के लिए जो सशक्त माध्यम होता है, वह होती है पूजा। जो कार्य एक मशीन द्वारा नहीं हो सकता। वह कार्य पूजा के द्वारा हो जाता।

पूजा के विभिन्न चरण

एक सफल पूजा के लिए विभिन्न चरण होते हैं, जो कि इस प्रकार हैं।

पवित्रीकरण

पूजा विधान का कार्य पवित्रीकरण की क्रिया से प्रारंभ करते हैं। यह एक भावनात्मक क्रिया है, सर्वप्रथम पूजन के द्वारा परमात्मा का एवं प्रकृति का ध्यान करने से पहले अपने आप को मन आत्मा एवं शरीर से पवित्र करना, मनवाणी एवं शरीर द्वारा अपने को शुद्ध करना, अर्थात भावना करना, कि अब मैं अत्यंत सात्विक कर्म करने को तैयार होता हूं। एवं एकाग्र भाव उत्पन्न करता हूं, इस भावना से शरीर एवं आत्मा का पवित्रीकरण करने की विधि की जाती है।

शिखा बंधन

शिखा रखना भारतीय संस्कृति का महत्वपूर्ण अंग है। शिखा स्थान बुद्धि का वह केंद्र स्थान है, जहां से बुद्धि में सभी प्रकार के विचार उत्पन्न होते हैं। उन्हें स्पाइनल कॉर्ड के द्वारा समस्त शरीर के अंगों तक पहुंचाने का कार्य इसी स्थान से प्रारंभ किया जाता है। स्पाइनल कॉर्ड मस्तिष्क से जुड़कर मस्तिष्क के समस्त विचारों का संप्रेषण करती है। इसीलिए इस स्थान पर शिखा रखी जाती है, जो स्पाइनल कॉर्ड का बाह्य स्वरूप है और गणपति का स्वरूप है, अर्थात पूजा विधि प्रारंभ करने से पूर्व परमात्मा से प्रार्थना करते हैं।कि बुद्धि उत्तम विचारों का संप्रेषण करें पूजा का प्रत्येक सद्भाव बुद्धि द्वारा शरीर को पूर्ण रूप से प्राप्त हो।

तिलक धारण करना

पूजन करने के पूर्व तिलक की स्थापना माथे पर की जाती है। कुमकुम रोली के द्वारा अथवा चंदन के द्वारा माथे पर तिलक धारण किया जाता है। अधिकतर मंगल कार्यों में कुमकुम का ही प्रयोग होता है। कुमकुम इसलिए माथे के अग्रभाग पर लगाते हैं, क्योंकि यह हमारी बुद्धि का अग्रभाग है, जिसे वैज्ञानिक भाषा में फ्रॉम कॉल लॉग कहते हैं। योग की भाषा में इस स्थान को आज्ञा चक्र कहते हैं। इस आज्ञा चक्र को शांति प्रदान करने के लिए कुमकुम लगाया जाता है। मन में प्रश्न यह उठ सकता है, कि कुमकुम ही क्यों लगाया जाता है। वह इस कारण की कुमकुम का निर्माण हल्दी एवं चूने को मिलाकर किया जाता है। हम सभी जानते हैं, कि हल्दी औषधि के समान गुण रखती है। हल्दी को घाव पर लगा दो तो ठंडक पड़ जाती है। जले हुए पर लगा दो तो ठंडक पड़ जाती है। उस औषधि गुण आयुक्त हल्दी एवं चूने के रासायनिक मिश्रण से कुमकुम का निर्माण होता है, जो आज्ञा चक्र पर लगाने से आज्ञा चक्र को शांति एवं एकाग्रता मिलती है। इसी प्रकार चंदन भी आज्ञा चक्र को ठंडक प्रदान करता है, इस भावना से बुद्धि को शांति प्रदान करने के लिए कुमकुम एवं चंदन का लेप आज्ञा चक्र पर किया जाता है।

रक्षा सूत्र

रक्षा सूत्र शब्द से ही समझ में आता है, कि पूजा करने वाले यजमान के उस हाथ में जिसके द्वारा वह पूरी पूजन क्रिया को क्रियान्वित करेगा रक्षण एवं पवित्रता के लिए रक्षा सूत्र बांधने की परंपरा बनी हुई है।

संकल्प

जिस भी विशेष पूजा का प्रकरण होता है, उसके अनुकूल परमात्मा के सामने संकल्प लेते हुए उस पूजन को करने का एवं उससे अच्छे फल की कामना करने हेतु इस संकल्प का विधान पूजा पद्धति में किया जाता है। इसमें पूजन की तारीख दिन समय संवत एवं चंद्र एवं समस्त ग्रहों की नक्षत्र एवं राशि गत स्थिति इत्यादि का विवरण देते हुए, उस व्यक्ति से संकल्प लिया जाता है। जिसके द्वारा वह पूजा करने वाला व्यक्ति परमात्मा से प्रार्थना करता है, कि उसकी पूजा का श्रेष्ठ फल उसे एवं उसके परिवार को प्राप्त हो।

* स्वाति वचन*

अर्थात शांति पाठ वह भी एक बहुत ही सुंदर प्रथा हमारी पूजा में होती है, जो पूजा प्रारंभ करने से पहले हम शांति पाठ करते हैं। इसका तात्पर्य है, कि पूजा के पूर्व पृथ्वी पर उपस्थित सभी जड़ एवं चेतन तत्वों को शांति मिले उनका हम पर आशीर्वाद रहे और प्रकृति के तत्वों से मानवजाति प्रसन्न रहो ऐसा भाव रखकर वैदिक मंत्रों का पाठ किया जाता है। उन सभी मंत्रों का यही तात्पर्य होता है, कि सब जगह सुख शांति हो पृथ्वी पर, अंतरिक्ष में, जल में, वनस्पति में, औषधि में सभी कुछ जो ईश्वर ने ब्रह्मांड में बनाया सभी को शांति प्राप्त हो इस प्रकार और भी अनेक मंत्र होते हैं, जो प्राकृतिक तत्वों से हमें सुख प्रदान करने की भावना से लिखे गए।

गणपति स्थापना पूजन का प्रारंभ गणपति की स्थापना से ही होता है। कोई भी विशेष कार्य हो विवाह, भूमि पूजन, ग्रह प्रवेश, व्यापार प्रारंभ, लक्ष्मी पूजन अथवा ग्रहों की शांति के पूजन या और भी किसी प्रकार की पूजा हो सर्वप्रथम गणपति स्थापना की जाती है।सभी शुभ कार्यों को करने से पहले गणपति की स्थापना की जाती है, क्योंकि सभी कार्य स्वस्थ बुद्धि के द्वारा ही संभव होते हैं। अतः सर्वप्रथम गणपति जी की स्थापना कर उपासना कर परमात्मा से प्रार्थना की जाती है, कि वह हमारी बुद्धि को स्थिर करें ताकि यह शुभ कार्य संपन्न हो सके।

पंचतत्व पूजन

यह पूजन गणपति स्थापना के पहले किया जाता है, जिसमें दीप प्रज्वलन कर पूजा का प्रारंभ किया जाता है। जो कि अग्नि की पूजा करने के लिए किया जाता है। दीप प्रज्वलन का कर पूजा का प्रारंभ इसलिए किया जाता है, क्योंकि सर्वप्रथम पूजन प्रारंभ करने से पहले परमपिता परमात्मा को जो दिव्य ज्योति के स्वरूप में है या अग्नि पुंज के स्वरूप में हैं, तो उनके उसी स्वरूप को सार्थक रूप में पूजने के लिए अग्नि जलाई जाती है। दूसरा कारण यह है, कि पंचतत्व जिनसे यह मानव शरीर बनता है, उसका पहला तत्व अग्नि है, अग्नि के द्वारा ही हमारा शरीर जीवित और स्वस्थ है जठराग्नि हमारे खाए भोजन को पचाने का कार्य करती है। भोजन का पचना और शरीर का जीवित रहना इस अग्नि के बिना संभव नहीं, इसी तरह हमारे शरीर का तापमान अभी अग्नि के द्वारा ही स्थिर रहता है। अतः अग्नि हमें हमेशा स्वस्थ और जीवित रखती है, इसलिए इस अग्नि का सर्वप्रथम सम्मान किया जाता है।

कलश स्थापना

प्रत्येक पूजन विधि में कलश स्थापना अवश्य की जाती है। कलश स्थापना कर ब्रह्मांड को नारियल का स्वरूप देकर उस पर समस्त देवताओं का आव्हान किया जाता है। पांच पान के पत्ते रखे जाते हैं या आम के पत्ते रखे जाते हैं, जिसका संकेत होता है कि हमें अपनी प्रकृति को बचाना है और कलश में जल भरकर यह संकेत होता है, कि जल हमारे जीवन के लिए कितना जरूरी है।

इसी तरह के अन्य विषयों में जानने के लिए आप वैदिक ज्योतिष शास्त्र विषय में अध्यन कर सकते है। इंस्टिट्यूट ऑफ़ वैदिक एस्ट्रोलॉजी जो एक सर्वश्रेष्ठ संस्थान है, जो आपको इस तरह के विषय में आपको तीन प्रकार से कोर्स उपलब्ध करता है। जैसे वैदिक एस्ट्रोलॉजी, विडियो वैदिक एस्ट्रोलॉजी तथा कॉम्बो कोर्स और वो भी दूरस्थ पाठ्यक्रम द्वारा आपके घर बैठे आपकी इच्छा अनुसार।‍

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GEMS_HEALING_&_CRYSTAL_THERAPY By Institute of Vedic Astrology Dec 26 2019

मोती एक नाम अनेक

हिंदी में जिसे मोती कहते हैं, संस्कृत में उसे मुक्ता कहते हैं या मुक्ता फल कहते हैं, अरबी और फारसी में गौहर मौरवादीद और अंग्रेजी में पर्ल कहते हैं।

प्राप्ति स्थान

मूंगे की तरह मोती भी पत्थर ना होकर जीवो विशेष के पेट से उत्पन्न होने वाला एकशैलखंड है। मोती की उत्पत्ति के विषय में अनेक मत प्रचलित हैं, सबका सार यह है कि समुद्री सीप की एक जाति विशेष के पेट से मोती निकलता है। यह सीप शिकारियों के द्वारा पकड़ा जाता है और फिर उसे मारकर पेट चीरकर मोती निकाला जाता है। अब तो वैज्ञानिकों ने कृत्रिम मोती बनाना प्रारंभ कर दिए हैं। समुद्री सीपी पाल कर उन्हें कुछ ऐसे विशिष्ट पदार्थ खिलाए जाते हैं जो सीपी के पेट में स्थित होकर विभिन्न तत्वों से अवतरित होकर मोती के रूप में बाजार में आते हैं, किंतु सर्वश्रेष्ठ मोती वही होता है, जो प्राकृतिक रूप में सीपी के पेट से निर्मित हुआ हो और चमक बनावट की दृष्टि से निर्दोष हो।

मोती के गुण

.मोती एकऐसारत्न है, जो कई सदियों से मनुष्य को लुभाता चला आ रहा है।मोती को रोजमर्रा की जरूरतों के हिसाब से पहना जा सकता है। साथ ही मोती एक ऐसा रत्न है, जिसे पूरे समय धारण किया जा सकता है। मोती की बनावट के अनुसार मोती के उपयोग भी होते हैं। मोती चंद्रमा ग्रह का रत्न है और चंद्रमा ग्रह निश्चित रूप से मन का कारक होता है। इसलिए सीधी सी बात है, कि मोती रत्न मन पर बहुत प्रभाव डालता है। एक अच्छा मोती मन को नियंत्रित कर पूरे जीवन को व्यवस्थित कर सकता है। ऐसे लोग जिनका मन बहुत चंचल होता है और उस चंचलता के कारण यदि वे जीवन में असफल होते हैं, तब मोती सबसे बढ़िया साधन होता है। उस मन को स्थिर करने का परंतु उसके लिए चपटा मोती धारण किया जाता है। एक स्वच्छ और चपटा मोती मन को व्यवस्थित कर एकाग्र करता है।इसके लिए बसरा का चपटा मोती श्रेष्ठ होता है।

ज्योतिष के आइने में मोती

कर्क लग्न का स्वामी चंद्रमा होता है और चंद्रमा का रत्न मोती होता है। इस आधार पर चंद्र रत्न मोती कर्क लग्न वालों के लिए निर्विवाद रूप से अनुकूल सिद्ध होता है। मोती धारण करके कर्क लग्न वाले व्यक्ति बहुत कुछ लाभ की अनुभूति करते हैं। सद्विचार, दीर्घायु, बौद्धिक, संपन्नता, स्वास्थ्य, लाभ, सौंदर्य, सद्भावना और प्रणयक्षेत्र में मोती उन्हें निश्चित रूप से लाभकारी होता है। ऐसे जातक यदि आजीवन मोती पहनने रहे, तो सहसा उन्हें किसी अभाव विरोध और विसंगतियों का सामना नहीं करना पड़ता है।

मोती एक औषधि के रूप में

सौंदर्य के अनुसार तो मोती रत्न और लाभकारी होता ही है। परंतु औषधि के रूप में भी मोती बहुत लाभकारी होता है। यदि मोती नारंगी रंग का है, तो वह रक्तविकार, रक्तस्त्राव, नेत्र विका,र तिमिर रोग, वक्ष पीड़ा, शारीरिक दुर्बलता, शक्ति हास, दृष्टि दोष, वीर्य दोष और कांति हास आदि रोगों में बहुत लाभकारी औषधि के रूप में सिद्ध होता है और इस बात की पुष्टि ज्योतिष शास्त्र के साथ-साथ भौतिक शास्त्र यानी कि पदार्थ विज्ञान शास्त्र भी कर चुका है।

विशेष रोग मिर्गी में मोती

भारतीय विद्वानों ने रत्नों के विभिन्न उपयोगों का अनुसंधान किया है। उनका निष्कर्ष है, कि जिस प्रकार आयुर्वेद में रत्नों की भस्म और पीष्ठी का प्रभाव रोग निवारक होता है। उसी प्रकार रत्न को उसके मूल रूप में धारण करने से भी रोग विकार शांत होते हैं। मिर्गी के रोग में मोती रत्न चमत्कारी प्रभाव दिखाता है। भ्रम, उन्मत्ता,मौन, प्रलाप और चेतना दौरा मिर्गी जैसे उपद्रव में और उनके शमन में मोती बहुत चमत्कार करता है। मानसिक और मस्तिष्क संबंधी विकारों में मोती धारण करके रोगी जन पर्याप्त लाभ उठा सकते हैं।

मोती विभिन्न आयाम

अंक शास्त्र के अनुसार मूल अंक दो होने पर उसके स्वामी ग्रह चंद्रमा के अनुकूल रत्न मोती पहनने पर लाभ प्राप्त होता है। साथ ही जब वर्णों के अनुसार रत्नों का विभाजन किया जाता है, तो वैश्य वर्ण के लिए मोती रत्न उपयोगी होता है। इसका अर्थ यह हुआ कि व्यापारी वर्ग यदि मोती धारण करता है और विशेषकर सबसे छोटी उंगली में यदि मोती पहनते हैं, तो व्यापारी वर्ग के लिए यह बहुत लाभकारी सिद्ध होता है। वैवाहिक अवसर पर वधु को मोती का उपहार दिया जाना कल्याणकारी होता है। वैसे भी मोती शांति दायक है, इसे धारण करने से व्यक्ति की मानसिक.अस्थिरता, उलझन, उत्तेजना, शुष्कता दूर हो जाती है यह रत्न ज्वर और मस्तिष्क की।उष्णता को शांत करके तन मन को निरोग व शीतल बनाता है।

सभी लग्न और मोती

मेष लग्न वाले जातकों का चंद्रमा कुंडली के चतुर्थ भाव में विराजमान होता है, यह एक शुभ स्थिति है। उधर मेष लग्न का स्वामी मंगल है, जो चंद्रमा का मित्र है। इस प्रकार मेष लग्न से चंद्रमा को सहयोग मिलता है। ऐसे लोग मोती धारण करके चंद्रमा और मंगल दोनों की कृपा प्राप्त करते हैं। वृषभ लग्न वालों को मोती नहीं पहनना चाहिए। मिथुन लग्न वाले जातक के लिए मोती का प्रभाव आने का होता है, उसे यह रत्न धारण नहीं करना चाहिए। कर्क लग्न का स्वामी चंद्रमा है, इस आधार पर चंद्र रत्न मोती कर्क लग्न वालों के लिए निर्विवाद रूप से अनुकूल सिद्ध होता है। मोती धारण करके कर्क लग्न वाले व्यक्ति बहुत कुछ लाभ की अनुभूति करते हैं। सिंह लग्न वाले जातकों के लिए मोती हानि-कार होता है। अतः उन्हें नहीं पहनना चाहिए। कन्या लग्न वाला व्यक्ति को मोती रत्न विविध प्रकार के भौतिक सुख उपलब्ध कराता है। ऐसे व्यक्ति यश, कीर्ति, मान-सम्मान, संतान-सुख और अर्थ लाभ अवश्य प्राप्त करते हैं। तुला लग्न वालों को मोती धारण करना वर्जित है। चंद्रमा की स्थिति वृश्चिक लग्न वालों के लिए अनुकूल रहती है, अतः चंद्र रत्न मोती उन्हें शुभ फल देता है। ऐसे ऐसे लोग जो वृश्चिक लग्न में जन्मे हो, मोती धारण करके जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में व्यवसाय, धन, उपार्जन, यात्रा, आध्यात्मिक क्षेत्र में लाभ उठाते हैं। धनु लग्न वालों को मोती नहीं पहनना चाहिए। मकर लग्न वालों को भी मोती नहीं पहनना चाहिए। कुंभ लग्न वालों को भी मोती विशेष फलदाई नहीं होता है, परंतु मीन लग्न वालों को मोती पहनने से लाभ मिलता है।

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Astrology By Institute of Vedic Astrology Dec 19 2019

कन्या राशि वालों का पंचमी शनि

गोचर क्या है।

हम सभी जानते हैं, कि पृथ्वी के साथ-साथ सभी ग्रह सूर्य का चक्कर लगाते हैं। यही गोचर कहलाता है। चंद्रमा सबसे तीव्र गति से परिक्रमा करता है और शनि सबसे धीमी गति से परिक्रमा करता है। इसी गति को समझने के लिए मनुष्य ने जन्म कुंडली का निर्माण किया और उसमें 12 खाने बनाए। इन 12 खानों को भाव कहते हैं और एक राशि में किसी ग्रह के रहने का समय और फिर अगली राशि में जाने को उसका गोचर कहते हैं। चंद्रमा सबसे एक राशि से दूसरी राशि 2.15 दिन में पहुंच जाता है। जबकि शनि ग्रह को एक राशि से दूसरी राशि तक जाने में ढाई वर्ष लगते हैं।

शनि ग्रह

ऐसे तो शनि ग्रह बड़ा लाभदायक रहता है, परंतु वह बहुत धीमा चलने वाला होता है और धीमी गति से परंतु स्थाई लाभ देता है। जब शनि ग्रह नाराज हो जाता है या फिर कष्ट देता है तो वह अत्याधिक कष्ट देता है। जनसाधारण में शनि की साढ़ेसाती बहुत प्रचलित है, क्योंकि साढ़ेसाती में पूरे साढे सात वर्ष कष्ट के ही बीते हैं, परंतु शनि की एक स्थिति ऐसी भी होती है। जो भी जो साढ़ेसाती के बराबर ही कष्ट देती है और वह स्थिति होती है चंद्र लग्न से पंचम स्थान का शनि इसे कहते हैं पंचमी शनि और कर्नाटक में एक कहावत है कि पंचमी शनि फूटे मटके में खाना खिलाता है।

पंचमी शनि कैसे कष्ट देता है

कर्नाटक प्रदेश में साढ़ेसाती से अधिक दर पंचम शनि का मानते हैं। शनि जब पंचम भाव में हो, तो उसकी दृष्टि धन दौलत के दोनों भागों अर्थात द्वितीय तथा एकादश पर पड़ती है। साथ ही व्यापार के स्थान सप्तम भाव पर भी इस कारण उनका यह डर भी निर्मल नहीं। जब मनुष्य के धन भाव और लाभ भाव पर संकट आता है, तो निश्चित रूप से उसे बहुत कष्ट प्राप्त होता है। साथ ही पंचम स्थान में स्थित शनि की दृष्टि सातवें भाव पर पड़ती है। जो कि व्यापार का भाव है और दांपत्य जीवन का भाव है। व्यापार पर संकट आना मनुष्य पर के जीवन पर संकट आने जैसा होता है। साथ ही दांपत्य जीवन में मतभेद होना और भी कष्टकारी बात होती है।

पंचमी शनि कौन-कौन से कष्ट देता है।

24 जनवरी 2020 को शनि मकर राशि में प्रवेश करेगा और कन्या राशि वालों के लिए यह शनि पंचमी शनि रहेगा। तो अगले ढाई वर्षों तक कन्या राशि वालों को कुछ परेशानियां हो सकती है, परंतु यदि अभी से उपाय किए जाएं। तो शनि कष्ट नहीं देगा, अन्यथा शनि धन की हानि करता है साथ ही आय को कम करता है। जीवनसाथी से वैचारिक मतभेद देता है। समाधान इस संकट से बचने के लिए बहुत सारे उपाय और समाधान हमारे पास हैं, परंतु उनको समझने के पहले हम शनि ग्रह के स्वभाव को समझते हैं। शनि ग्रह ऐसा ग्रह होता है, जो पहले व्यसनों के लिए उकसाता है, परंतु बाद में वही दंड भी देता है। तो हम इस सब से बचने के लिए यह उपाय करें, कि इस छोटी ढहिया के दौरान व्यसनों का त्याग कर दें। साथ ही यदि कहीं बाहर जाना पड़े, तो अपने साथ घर से भोजन लेकर चले, साथ ही पानी भी लेकर चले। जहां तक संभव हो इसके साथ ही यदि किसी रिश्तेदार के घर भोजन करना पड़े। तो किसी ना किसी रूप में उस भोजन की कीमत अदा कर दे। इस अवधि में ना तो किसी से लोहा दान में लें और ना ही किसी को लोहा दान करें और ना ही लोहा खरीदें। जहां तक संभव हो अपाहिजओं को कंबल का दान करें और यदि वह विधवा हो और साथ ही अपाहिज भी हो तो अति उत्तम।

प्रभावशाली उपाय

शनि की इस छोटी ढैया के दौरान दान करने वाली जो वस्तुएं होती है। वह काला उड़द, तेल, नीलम, काला तिल, कुलथी, भैंस, लोहा बर्तन के रूप में, दक्षणा, काला कपड़ा आदि पदार्थों का दान, शनि ग्रह की प्रसन्नता के लिए करना चाहिए। साथ ही शनि की स्तुति का मंत्र

नीलांजन समाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम ।
छाया मार्तंड संभुतम तम नमामि शनिश्चरा।।

इस मंत्र की स्तुति करने से शनिदेव प्रसन्न होते हैं। साथ ही मंत्र के जप करने से जो कि दो प्रकार के मंत्र हैं पहला है।

“ओम शं शनिश्चराय नमः” और दूसरा “ओम प्राम प्रीम प्रौम स शनिश्चराय नमः” साथ ही विशेष रूप से शिवपूजन, हनुमंत पूजन और महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें।

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VASTU By Institute of Vedic Astrology Dec 12 2019

हमारे जीवन में पौधों की भूमिका

सबसे पहले यह पृथ्वी आग का गोला थी फिर यह ठंडी हुई और इतनी ठंडी हुई कि फिर इस पर सबसे पहले वनस्पति उगना प्रारंभ हुई और उसके बाद जीव जंतु आए और अंत में मनुष्य शायद इसीलिए मनुष्य को आज भी मैं वनस्पतियों और प्रकृति से बहुत प्रेम है क्योंकि वह उन्हीं का एक हिस्सा है वनस्पति में भी कुछ पौधे जंगली होते हैं परंतु कुछ पौधे लाभकारी होते हैं वह आपके मन को भी खुशी देते हैं और आपके शरीर को स्वास्थ्य देते हैं साथी आपके घर का वातावरण उर्जा माई बना देते हैं

पौधे कुछ कहते हैं

जब हम घर बनाते हैं तब हमें यह नहीं पता चलता कि हमें कौन से पौधे लगाने हैं तो हमें जो पौधे मिल जाते हैं हम उन पौधों को ही लगा लेते हैं परंतु सभी पौधे शुभ नहीं होते हैं कुछ पौधे जैसे नागफनी या कैक्टस बहुत कांटेदार पौधे हमारे घर के लिए भी शुभ नहीं होते हैं और हमारे मन की स्थिति के लिए भी शुभ नहीं होते हैं इसके स्थान पर फूलदार रसिया खुशबू वाले वृक्ष हमारे मन को भी सुकून पहुंचाते हैं और हमारे घर के वातावरण में एक नई ऊर्जा लाते हैं तू हम समझते हैं कि कौन से पौधे लगाना चाहिए और कौन से पौधे नहीं लगाना चाहिए

चमत्कारी पौधे

कुछ पौधे घर की सकारात्मक ऊर्जा के लिए चमत्कारी सिद्ध होते हैं परंतु उन्हें किस दिशा में लगाना यदि इस बात का भी ध्यान रख लिया जाए तो और अधिक शुभ होता है घर की उत्तर दिशा में पौधों का रोपण करना शुभ होता है परंतु तुलसी को घर की सीमा में कहीं भी लगाना शुभ होता है पूर्णांक अशोक मोलश्री शमी तिलक चंपा अनार पीपली डाक अर्जुन गंभीर सुपारी कटहल केतकी मालती कमल चमेली मल्लिका नारियल केला एवं पाटन वृक्षों से सुशोभित घर लक्ष्मी का विस्तार करता है

अशोक वृक्ष

अपनी सगन सुखदाई नहीं छाया के द्वारा इस वक्त ने जिस प्रकार मां सीता के दुख को कम किया था ठीक उसी प्रकार इस वृक्ष के कई ऐसे औषधीय उपयोग हैं जो कि स्त्रियों में होने वाली व्याधियों को काफी हद तक करने में सक्षम है अशोक की छाल में टैनिन तथा कटे चिन्ह नामक रसायन पर्याप्त मात्रा में होते हैं जो कि औषधीय महत्व के हैं अशोक से निर्मित अशोकारिष्ट नामक औषधि बहुत गुणकारी है अशोक के बीजों को दो माशा चूर्ण को जल के साथ नित्य कुछ दिनों तक लेने से अश्वरी रोग चला जाता है अशोक के वृक्ष के नीचे स्नान करने वाले व्यक्ति की ग्रह जनित बाधाएं दूर होती हैं मंदबुद्धि स्मृति लोक के शिकार एवं ऐसे जातक जिनकी पत्रिका में बुध ग्रह नीच का हो उनके लिए अशोक वृक्ष के नीचे स्नान करना अत्यंत शुभ कार्य है

केला

केले का वृक्ष लगाना हर तरह से सुखदाई होता है जहां एक और केले के पत्ते पर भोजन किया जा सकता है थाली के रूप में वहीं पर दूसरी ओर पका हुआ केला शीतल वीर्य वर्धक शरीर के लिए पुष्टि दायक मांस को बढ़ाने वाला भूख प्यास को दूर करने वाला तथा नेत्र रोग और प्रमेह नाशक होता है पेट के कीड़े मारने तथा खून शुद्ध करने के लिए केले केले की जड़ के अर्क का सेवन लाभदायक है केले की अर्क को बनाने के लिए लगभग 1 किलो जल में 50 ग्राम केले की जड़ डालकर इतना गर्म करें कि जल की मात्रा आदि हो जाए इसके बाद इस मिश्रण को  96 यही छना हुआ जल केले का अर्थ है

पीपल

किसी भी घर में पश्चिम में पीपल वृक्ष का होना अत्यंत शुभ है ज्योतिष शास्त्र की मान्यता है कि शनि ग्रह से पीड़ित व्यक्ति को शनिवार के दिन पीपल के वृक्ष की जड़ में जल चढ़ाने से पर्याप्त शांति प्राप्त होती है पीपल की परिक्रमा करने से देवता प्रसन्न होते हैं तथा ग्रहों का कुप्रभाव नहीं रहता है

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Astrology By Institute of Vedic Astrology Dec 05 2019

भूमिका

प्रकृति ने मनुष्य को छठी इंद्री के रूप में मन का उपहार दिया है। इस सौगात के बलबूते पर मनुष्य कई अनसुलझी पहेलियां भी सुलझा लेता है और कई रहस्यों से पर्दा भी उठा सकता है।  उनमें से एक गुण यह है कि वह शुभ या अशुभ को देखकर उनके मूलभूत कारणों का पता भी लगा सकता है| शायद यही वजह है, कि ज्योतिष शास्त्र के आधार पर जीवन में होने वाले कष्ट देखकर राहु के अशुभ होने की बात पता लगा सकते हैं|

स्थितियां कष्टों के अनुसार अशुभ राहु -

जीवन में जब कष्ट आते हैं, तो उनके कारण अशुभ ग्रह होते हैं। अलग-अलग ग्रहों के अशुभ होने पर अलग-अलग प्रकार के कष्ट मिलते हैं। हम राहु की विभिन्न अशुभ स्थिति को उनके परिणामों द्वारा समझते हैं।

  1. यदि जीवन में सुख की हानि है या अपमान मिल रहा हो या परिवार से समाज से अपमान मिल रहा हो तो समझना चाहिए कि राहु जन्म कुंडली में अशुभ होकर लग्न में बैठा है।
  2. यदि जातक को धन हानि हो रही हो, खास कर स्थाई या पैतृक संपत्ति की हानि से नुकसान हो या व्यापार में धन हानि हो या जातक की वाणी में क्षोभ हो या वाणी में कटुता कहीं गई हो या कुटुम से वियोग या विरोध हो तब उस स्थिति में राहु अशुभ होकर द्वितीय भाव अर्थात धन भाव में बैठा होता हैl
  3. यदि जातक के परिवार में कलह - क्लेश बढ़ गया हो या उसके मन में दुख निराशा हो या कृषि या संपदा की हानि हो रही हो, तो निश्चित रूप से अशुभ राहु चौथे भाव अर्थात माता के भाव में स्थित है।
  4. यदि जातक की बुद्धि भ्रमित होने के कारण हानि हो रही हो या उसे सबके प्रति कु विचार आते हो या वह कुसंगति में पड़ गया हो या उसे पुत्र या मित्रों से दुख व क्लेश मिल रहा हो या उसके हर कार्य में बाधा आती हो तो समझना चाहिए कि अशुभ राहु पंचम भाव में स्थित हैl
  5. यदि जातक के अपनी पत्नी से मतभेद हो या उसके दांपत्य जीवन में तनाव हो या उसके साथ अलगाव की स्थिति हो तो निश्चित रूप से अशुभ राहु सप्तम भाव अर्थात विवाह स्थान में स्थित है ।
  6. यदि जातक को हर क्षेत्र में अपमान मिल रहा हो या हर कार्य में असफलता वह अपयश मिल रहा हो या उसके पद से उसे कई बार अब अवनति मिलती हो या उसे महान शारीरिक कष्ट उठाने पड़ते हो तो ऐसे में जन्म कुंडली में अशुभ राहु अष्टम भाव अर्थात मृत्यु के स्थान में स्थित होता है l
  7. यदि जातक के अपने पिता से मतभेद या विरोध होते हो या गुरुजन से विरोध होते हो या उसके भाग्य में बाधा या हानि होती है, तो उस स्थिति में राहु अशुभ होकर नवम भाव अर्थात भाग्य स्थान में स्थित है।
  8. यदि जातक के आपस में खर्चे बढ़ गए हो या उसे अनावश्यक जुर्माना भरना पड़ रहा हो या दंड का भागी बन रहा हो या उसे शारीरिक पीड़ा अधिक हो या उसकी बंधन की स्थितियां हो तो निश्चित रूप से अशुभ राहु द्वादश भाव अर्थात बारहवें स्थान में स्थित है।

निष्कर्ष- इस प्रकार जातक के जीवन में मिलने वाले परिणामों से राहु के अशुभ या शुभ होने के संकेत मिलते हैं।

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